सांबा। जिले में एक चौंकाने वाला सच सामने आया है। इसमें मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजिंदर सम्याल ने बताया कि पांच साल में कैंसर के 100 से ज्यादा केस सामने आए हैं।
उन्होंने बताया कि इसका स्पष्ट कारण अभी तक पता नहीं चल पाया है कि यह किसके कारण हो रहे हैं। नियमित तौर पर औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला जहरीला धुआं, बीड़ी सिगरेट ज्यादा पीने वाले व्यक्ति, फेफड़ों का कैंसर, लीवर का कैंसर जैसे कई प्रकार के कैंसर होता है जिससे मरीज की ज्यादातर मौत हो जाती है। इसका असर अब युवाओं में भी देखने को मिल रहा है। जिले के सीमावर्ती गांव चिल्लयारी के राजिंदर सिंह जिनकी उम्र मात्र 30 साल है, ने बताया कि में घर में ही खेती का काम करता हूं। लगभग एक साल पहले मेरे मुंह में एक छोटा सा छाला पड़ गया था, जिससे सांबा या जम्मू के अस्पताल में दिखाता रहा, लेकिन बाद में पता चला कि यह तो कैंसर की बीमारी है। इसके लिए हम और हमारे घर वाले सब परेशान हो गए। क्योंकि जम्मू के सरकारी अस्पताल में इसका इलाज संभव नहीं था। इसके लिए मुझे दूसरे राज्य में गैर सरकारी अस्पताल का रुख करना पड़ा। जहां लाखों खर्च करने के बाद अभी भी इलाज चल रहा है। वहीं सीमावर्ती गांव चचवाल के गोपाल सिंह (34) का भी यही कहना है। गोपाल ने बताया कि सरकार की ओर से न तो इसका इलाज होता है और न ही कोई मदद की जाती है।
इस बाबत जिला प्रदूषण अधिकारी अंगरेज सिंह ने बढ़ते प्रदूषण के बारे में बताया कि सांबा औद्योगिक क्षेत्र को तीन फेज में बांटा गया है, जिसमें 450 के करीब इकाइयां हैं और इनमें स्टोन क्रशर, ईंट भट्ठे भी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि हमने ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली इकाई को रेड जोन में रखा होता है। इससे काम वाली को ऑरेंज जोन उससे काम वाली ग्रीन और सबसे काम यानी प्रदूषण नहीं फैलाने वाली को वाइट जोन में रखा होता है। सांबा औद्योगिक क्षेत्र की अगर बात करें तो इसमें 40 इकाइयां ऐसी हैं जो रेड जोन में आती हैं। इसके अलावा यहां पर कीट नाशक दवाई बनाने वाली इकाइयां भी काफी हैं। अंगरेज सिंह ने बताया कि हमारे विभाग लगातार सभी इकाइयों पर नजर रख रहा है अगर कोई भी इसकी खिलाफवर्जी करता पाया गया तो उसके खिलाफ हम सख्ती से निपटते हैं। इससे पहले हमने कई बार इकाइयों को बंद भी किया है जोकि प्रदूषण नियंत्रण की खिलाफवर्जी करती थीं।
उन्होंने बताया कि पिछली बरसात में हमारे विभाग और इकाइयों की संस्था ने मिलकर कर बसंतर नदी के दोनों किनारों पर एक लाख पौधे लगाने का संकल्प लिया था, जोकि अभी भी चल रहा है। इससे भी हमारे वातावरण को काफी फायदा पहुंचेगा।