हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एनपाल वसंथाकुमार और जस्टिस धीरज सिंह ठाकुर की खंडपीठ ने आरटीआई कार्यकर्ता की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि जेएंडके बैंक स्टेट से हद से अधिक कमीशन ले रहा है। खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता का आग्रह है कि सभी पब्लिक अथारिटी के तमाम मुख्य हेड की पेमेंट जेएंडके बैंक में जमा करवाई जाती है।
इससे बैंक को लाभ पहुंचाया जा रहा है। तमाम चालान की फीस जेएंडके बैंक में जमा करवाने के आदेश को रद्द कर इसे सरकारी ट्रेजरी में जमा करवाया जाए। साथ ही मामले की सीबीआई जांच करवा कर राजस्व को होने वाले नुकसान के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। अदालत ने पाया कि वित्त विभाग के विशेष सचिव का तर्क है कि पहले जेएंडके बैंक की शाखाओं में सरकारी कैशियर होते थे, लेकिन आरबीआई की ओर से इस संबंध में सुविधा मुहैया करवाने के बाद सरकार ने बैंक में लगे तमाम सरकारी कैशियरों को वापस बुला लिया।
सुविधा हासिल करने के लिए सरकार जेएंडके बैंक को कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं दे रही। जो भी सर्विस चार्ज होता है, वह आरबीआई बैंक को देता है। सरकार द्वारा प्राप्त तमाम राजस्व को बैंक संचालित करता है। इस संबंध में बैंक सरकार से जो चार्ज करता है, वह काफी निम्न है। आरबीआई के साथ सरकार के हुए समझौते के अनुसार जेएंडके बैंक को आरबीआई का एजेंट करार दिया गया है।
इससे बैंक को सरकार से कोई कमीशन या पेमेंट नहीं मिलती है। अदालत को बताया गया कि बैंक में सरकार का 53 फीसदी शेयर है। इसलिए अन्य बैंकों की तुलना जेएंडके बैंक को प्राथमिकता दी जाती है। वर्ष 2013-14 में बैंक ने सरकार को 125 करोड़ का लाभांश दिया था। खंडपीठ ने पाया कि सीनियर एएजी ने आरबीआई और जम्मू-कश्मीर सरकार के बीच 21 जनवरी 2011 को आरीबीआई अधिनियम 1934 की धारा 21 ए के तहत समझौता हुआ है।
उस समझौते को काउंटर हलफनामे के रूप में पेश किया गया है। कोर्ट ने आदेश दिया कि इसकी कापी याचिकाकर्ता के वकील को मुहैया करवाई जाए। तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कहा कि इस मामले में कोई ऐसा केस नहीं बनता, जिस पर अदालत निर्देश जारी करे। साथ ही अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया।
जेएनएफ