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फारूक अब्दुल्ला बोले, जब राज्यपाल मलिक ने हुर्रियत से बातचीत की बात कही है तो करें

Mon, 24 Jun 2019 01:42 PM IST
Pranjal Dixit न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
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फारूक अब्दुल्ला - फोटो : फाइल, एएनआई
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नेशनल कांफ्रेंस के सांसद, फारूक अब्दुल्ला ने सोमवार को कहा कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल, सत्यपाल मलिक का कहना है कि हुर्रियत से बातचीत के लिए वह सहमत हो गए हैं, फिर, उनके साथ बातचीत होनी चाहिए।
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आपको बता दें कि राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने शनिवार को कहा था कि पिछले साल अगस्त से कश्मीर घाटी में हालात बेहतर हुए हैं और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस सरकार के साथ बातचीत करना चाहती है। मलिक ने कहा, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस बातचीत करना नहीं चाहती थी। राम विलास पासवान उनके दरवाजे पर (2016 में) खड़े थे, लेकिन वे लोग बातचीत के लिए तैयार नहीं थे। 

राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा, आज वे बातचीत के लिए तैयार हैं और वार्ता करना चाहते हैं। मलिक ने कहा कि पिछले साल अगस्त में जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनने के बाद से यहां के हालात में सुधार हुआ है। आतंकवादियों की भर्ती लगभग थम गई है और शुक्रवार को होने वाली पथराव की घटनाएं भी बंद हो गई है।
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राज्यपाल ने कहा जब कोई युवक मारा जाता है तो हमें अच्छा महसूस नहीं होता। उन्होंने कहा लेकिन जब कोई गोली चलाएगा तब सुरक्षा बल भी जवाबी गोलीबारी करेंगे। वे गुलदस्ता नहीं भेंट करेंगे। उन्होंने संकेत दिया कि देश में कहीं और बैठ कर कश्मीर के हालात का आकलन करना आसान नहीं है।
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जम्मू-कश्मीर में अटल सरकार में पहली बार अलगाववादियों से बातचीत की हुई थी पहल

जम्मू-कश्मीर में पहली बार अलगाववादियों से बातचीत की पहल केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने की थी। 2004 में तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने अलगाववादियों के साथ बात की थी। हालांकि, यह बातचीत परवान नहीं चढ़ सकी। अलगाववादी नेता हुर्रियत (एम) प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक, बिलाल गनी लोन, अब्दुल गनी भट, मौलाना अब्बास अंसारी व फज-उल-हक कुरैशी दिल्ली में उप प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई बातचीत में शामिल हुए थे। लगभग ढाई घंटे तक चली बातचीत के बाद अलगाववादियों ने दावा किया था कि शांति प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से चलेगी। 

बातचीत में यह सुझाव आया था कि बंदूक को राजनीतिक बातचीत के जरिये बदला जाएगा। इसके बाद दूसरे दौर की वार्ता भी मार्च 2004 में हुई, लेकिन फिर बातचीत का सिलसिला थम गया क्योंकि केंद्र में वाजपेयी की सरकार बदल गई। इसके बाद यूपीए की सरकार केंद्र में आई। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 में कश्मीर में सुरक्षा बलों की संख्या में कटौती करने का अलगाववादियों से वादा किया, लेकिन यह बात परवान नहीं चढ़ सकी। 

वर्ष 2017 में केंद्र सरकार ने घाटी में शांति बहाली तथा सभी पक्षकारों से बातचीत के लिए केंद्रीय वार्ताकार के रूप में दिनेश्वर शर्मा की नियुक्ति की। दिनेश्वर ने विभिन्न जिलों में जाकर युवाओं, विभिन्न संगठनों तथा राजनीतिक दलों के नेताओं से बात कर उनकी समस्याओं को जानने का प्रयास किया। इससे पहले 2016 में हिजबुल कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी में भड़की हिंसा पर तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में सांसदों के दल ने घाटी का दौरा किया था। तब भी अलगाववादियों को बातचीत का तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने न्योता दिया था, लेकिन कोई भी अलगाववादी आगे नहीं आया। 

वाजपेयी ने नियुक्त किया था पहला वार्ताकार
वर्ष 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीर पर राजनीतिक वार्ता की घोषणा करते हुए केंद्र का पहला वार्ताकार नियुक्त किया। बाद में 2003 में एनएन वोहरा को वार्ताकार बनाया गया, लेकिन वे भी अलगाववादियों से बातचीत में विफल रहे। अलगाववादी सीधे प्रधानमंत्री से बात के लिए दबाव बनाते रहे। 
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