रक्षा बंधन के अवसर पर साहिब बंदगी के सद्गुरु मधु परमहंस महाराज ने रांजड़ी जम्मू में अपने प्रवचनों की अमृत वर्षा से संगत को निहाल करते हुए कहा का हरेक मनुष्य का अपना संसार है। वास्तव में संसार है ही नहीं। यही बात गुरु वशिष्ठ ने श्री राम से कही। जब राम जी ने कहा कि यह संसार दुखों का घर है तो वशिष्ठ जी ने कहा कि हे राम, किस संसार की बात कर रहे हो, संसार तो कभी हुआ ही नहीं है। यह केवल तुम्हारे चित्त की कल्पना है। तुम सोच रहे हो कि सूर्य है, चांद है तो वो है।
आप देखें कि बालक जन्म लेकर आता है। माता पिता के संस्कार उसके चित्त में प्रविष्ट होते हैं। वाणी, उठना-बैठना आदि सब उसके चित्त में फीड होता जाता है।तो कहा कि हे राम, यह सब मन के विकास से दिखाई देता है, वास्तव में इसका स्वरूप कुछ नहीं है। यह सब भ्रम है। कितनी अनूठी बात है। जैसे मरुस्थल में दूर क्षेत्र पर धरती और आकाश मिलता हुआ दिखाई देता है, यह भ्रम है। वास्तव में ऐसा नहीं है। मृग जल की आकांक्षा करके दौड़ता जाता है। पर वहां पर जल नहीं है। वो दौड़ते-दौड़ते थक जाता है और मर जाता है। इस तरह संसार के सुख भी मृग मरीचिका की तरह हैं। इसमें कुछ नहीं है। आपकी आत्मा स्वयं आनन्द का कुंड है।
तो कहा कि हे राम, जो ज्ञानवान होता है, वो इस सत्य को जानता है। इस संसार की उत्पत्ति आदि से नहीं हुई है। सारा संसार आकाश से है। जैसे आकाश में नीलिमा दिखाई देती है, वैसे ही यह जगत प्रतीत होता है। इसलिए ज्ञानी पुरुष को जगत का मोह नहीं लगता है। जब भी बालक विद्यालय में जाता है तो अध्यापक उसे स्वर व्यंजन और गणित सिखाता है। इस तरह अगर आत्मा, मन, प्रकृति को अलग कर दो तो अध्यात्म नहीं रहेगा। इसमें मन जरूरी है। क्योंकि बंधन का कारण और कारक ही मन है।
जैसे आकाश नीला प्रतीत होता है, पर है नहीं। दृष्टि विकार से आकाश नीला दिखाई देता है। इस तरह संसार है ही नहीं। यह नींद के सपने की तरह है। नींद में हरेक आदमी सपना देखता है। सपने में कभी कभी बड़ी अनूठी चीजें मिलती हैं। उस चीजों का दुख भी होता है और खुशी भी होती है।