पैरालंपिक पदक से विश्व चैंपियन तक शीतल का सफर
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धनुष पैरों में, निशाना आंखों में और जीत का जज्बा दिल में। जम्मू के किश्तवाड़ की शीतल देवी दोनों हाथों के बिना दुनिया की बेहतरीन पैरा तीरंदाजों में शामिल हैं। पैरों और शरीर के संतुलन की मदद से धनुष संभालती हैं, प्रत्यंचा खींचती हैं और निशाना साधती हैं। शीतल की कहानी बताती है कि खिलाड़ी की क्षमता उसके शरीर की सीमाओं से नहीं, बल्कि उसके हौसले और अभ्यास से तय होती है।
प्रधानमंत्री ने वीरवार को खेलो इंडिया संवाद में कुछ इसी अंदाज में अपनी शीतल को सम्मान दिया। उन्होंने कहा कि शीतल के पदक जीतने पर जम्मू-कश्मीर के साथ ही पूरा हिंदुस्तान गर्व से भर उठा। खेल सिर्फ पदक जीतने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को बेहतर इंसान बनाता है। खेल हमें उठना, गिरना और गिरकर फिर उठना सिखाता है। शीतल देवी की कहानी इसी जज्बे और संघर्ष की मिसाल है।
दोनों हाथों के बिना तीर चलाती हैं शीतल
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किश्तवाड़ के छोटे से गांव का सपना जब दुनिया ने देखा
जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के लोइधर गांव निवासी शीतल देवी ने अपनी असाधारण प्रतिभा और दृढ़ इच्छाशक्ति से पैरा तीरंदाजी में अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई है। दोनों हाथों के बिना तीरंदाजी करने वाली शीतल ने अपने पैरों और शरीर की तकनीक के सहारे तीर चलाने की ऐसी कला विकसित की, जिसने दुनिया को हैरान किया। उनकी खेल यात्रा को कटड़ा स्थित श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में प्रशिक्षण से बड़ी मजबूती मिली। यहीं से उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनानी शुरू की।
-पैरालंपिक पदक जीतने वाली सबसे कम उम्र की भारतीयों में शामिल
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पैरालंपिक के पोडियम से विश्व चैंपियन के ताज तक
शीतल ने पेरिस पैरालंपिक-2024 में मिश्रित टीम कंपाउंड तीरंदाजी में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा। इसके बाद उन्होंने 2025 में विश्व पैरा तीरंदाजी चैंपियनशिप में महिला कंपाउंड व्यक्तिगत वर्ग का स्वर्ण पदक जीतकर विश्व चैंपियन का खिताब अपने नाम किया। 2026 में भी उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन जारी रखा है। बैंकॉक में आयोजित प्रतियोगिता में उन्होंने रजत पदक जीता। इसके अलावा नोवे मेस्तो में वर्ल्ड आर्चरी पैरा सीरीज में भी उनके खाते में रजत पदक आया।
शीतल सिर्फ खिलाड़ी नहीं, एक संदेश हैं...
शीतल की उपलब्धि की खासियत सिर्फ उनके पदकों में नहीं है। उनकी कहानी यह बताती है कि खेल की असली ताकत परिस्थितियों से लड़ने और लगातार आगे बढ़ने में है। प्रधानमंत्री का उनके उदाहरण के जरिए खेल की ताकत बताना इसी संदेश को बयां करता है। किश्तवाड़ की शीतल ने यह साबित किया है कि सीमित संसाधन या शारीरिक चुनौतियां मंजिल की राह में बाधा नहीं होतीं। दृढ़ इच्छाशक्ति, सही प्रशिक्षण और लगातार मेहनत हो तो गांव की पगडंडी से दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच तक पहुंचा जा सकता है। प्रधानमंत्री के शब्दों में कहें तो खेल हमें गिरने से नहीं बचाता, बल्कि गिरने के बाद फिर खड़े होकर आगे बढ़ना सिखाता है। शीतल देवी इसकी सबसे प्रेरक मिसाल हैं।