डॉ. अरुण कुमार रॉय
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51 साल की उम्र में जब दोबारा किताबें खोलीं तो सामने कोई परीक्षा नहीं, बल्कि खुद को फिर से विद्यार्थी साबित करने की चुनौती थी। करीब तीन दशक से रक्षा क्षेत्र में काम कर रहे डीआरडीओ के वैज्ञानिक डॉ. अरुण कुमार रॉय ने नौकरी के बीच आईआईटी जम्मू का रुख किया। वजह थी अपने ही विशेषज्ञता क्षेत्र में सामने आई एक नई तकनीक को गहराई से समझना।
पांच साल बाद 56 की उम्र में उन्होंने पीएचडी पूरी की। इस दौरान उन्होंने न केवल शोध पूरा किया, बल्कि पीएचडी में टॉपर भी रहे। डॉ. रॉय की कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने उस उम्र में पढ़ाई शुरू की, जब आमतौर पर लोग औपचारिक शिक्षा से आगे निकल चुके होते हैं। उनके लिए उम्र सीखने में रुकावट नहीं बनी। शनिवार को अमर उजाला से बातचीत में वह कहते हैं, सीखने की कोई उम्र नहीं होती।
30 साल के अनुभव के बाद फिर शुरू की पढ़ाई
मूल रूप से बिहार के मधुबनी के रहने वाले डॉ. रॉय ने 1996 में एमआईटी मुजफ्फरपुर से बीटेक किया और उसी साल रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन से जुड़ गए। वर्ष 2002 में आईआईटी बॉम्बे से एमटेक किया। इसके बाद रक्षा क्षेत्र में काम करते हुए उन्होंने गन बैरल को मजबूत बनाने वाली हाइड्रोलिक ऑटोफ्रेटेज में विशेषज्ञता हासिल की। गन बैरल बंदूक या तोप की वह नली है, जिससे गोली या गोला बाहर निकलता है। फायरिंग के दौरान इसके भीतर बहुत अधिक दबाव पैदा होता है।