अब तक सात बार पलायन
- पहला पलायन (1389–1413) : सुल्तान सिकंदर बुतशिकन के शासनकाल के दौरान।
- दूसरा पलायन (1586) : मुगल सम्राट अकबर द्वारा कश्मीर को जीतने के बाद।
- तीसरा पलायन (1753) : अफगान (दुर्रानी) शासन के आगमन के समय।
- चौथा पलायन (1819) : सिख शासन के दौरान।
- पांचवां पलायन (1931) : डोगरा शासन के खिलाफ सांप्रदायिक दंगों के दौरान।
- छठा पलायन (1986): अनंतनाग और कश्मीर के अन्य हिस्सों में भड़के दंगों के कारण।
- सातवां और सबसे बड़ा पलायन (1990 के दशक में): आतंकवाद और चरमपंथ के उभार के बाद।
पनुन कश्मीर संविधान के आठ भाग में हैं 29 अनुच्छेद
भाग-1 में तीन अनुच्छेद 1-3 तक उद्देश्य, सिद्धांत और व्याख्या की गई है। भाग-2 के अनुच्छेद 4 में संवैधानिक संरचना की जानकारी। भाग-3 के अनुच्छेद 5-7 तक में आम सभा के बारे में बताया गया है। भाग-4 में अनुच्छेद 8-17 तक कार्यकारी संरचना, भाग-5 में अनुच्छेद 18-22 तक कॉलेजियम के बारे में और भाग-6 में अनुच्छेद 23-24 के तहत जवाबदेही, निष्कासन और अनुशासनात्मक ढांचा का विवरण दिया गया है। भाग-6 में अनुच्छेद 25-28 में संबद्ध शाखाएं और संस्थागत एकीकरण और भाग-8 में अनुच्छेद 29 में शिकायत निवारण प्रकोष्ठ के बारे में अवगत कराया गया है। इसके अलावा अनुबंध के परिशिष्ट-1 में मार्गदर्शन संकल्प-1991 और परिशिष्ट-2 में पनुन कश्मीर नरसंहार और अत्याचार निवारण विधेयक-2020 के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है।
कश्मीरी पंडित समुदाय अब तक सात बार विस्थापित हो चुका है लेकिन अब आगे नहीं होगा। 1990 में तो हमारा विस्थापन नहीं बल्कि निष्कासन हुआ। नरसंहार हुआ। पनुन कश्मीर के संघर्ष को जारी रखने, भावी पीढ़ी को अतीत से अवगत कराने और मार्गदर्शन के लिए कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ पनुन कश्मीर का निर्माण किया गया है। भारतीय संविधान की तरह यह हम कश्मीरी समुदाय के सुरक्षा कवच के रूप में काम करेगा। देश-विदेश में रह रहे लोगों के बीच इसे ऑनलाइन और पुस्तक के रूप में पहुंचाया जा रहा है। टीटू गंजू, अध्यक्ष पनुन कश्मीर/सदस्य संविधान समिति