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मुठभेड़ स्थलों पर लोगों का जमा होना बड़ी चिंता : डीजीपी

Wed, 22 Feb 2017 11:45 AM IST
अमृतपाल सिंह बाली, अमर उजाला/श्रीनगर
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डीजीपी डॉ एसपी वैद - फोटो : File Photo
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कश्मीर में मुठभेड़ स्थलों पर स्थानीय लोगों का जमा होना डीजीपी डॉ एसपी वैद ने एक बड़ी चिंता बताया है। लोगों द्वारा कानून व्यवस्था को बिगाड़ने के प्रयास को पुलिस एक बड़ी चुनौती मान रही है। वैद के अनुसार ऐसी स्थिति से निपटने के लिए पुलिस नई रणनीति तैयार कर रही है।
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डीजीपी ने स्वीकारा है कि सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ों के दौरान स्थानीय लोगों का घटनास्थल के आसपास एकत्रित होना और कानून व्यवस्था में खलल डालकर आतंकियों को फरार होने में सहायता करना बड़ी चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा कि हर बदलती स्थिति के साथ पुलिस भी अपनी रणनीति में बदलाव लाती है ताकि किसी भी स्थिति से सही ढंग से निपटा जा सके। फिलहाल मौजूदा स्थिति पर विचार विमर्श कर एक नई रणनीति तैयार की जा रही है ताकि इससे अच्छे से निपटा जा सके और इस दौरान कोई नुकसान न हो।
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90 के दशक की रणनीति अफना रहे उपद्रवी

मुठभेड़ के दौरान मोर्चा संभाले जवान - फोटो : Amar Ujala
दक्षिणी कश्मीर में तैनात पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि 12 फरवरी को कुलगाम जिले के फिसल में हुई मुठभेड़ में मारे गए चार आतंकियों को देखने और उनके जनाजे में शामिल होने करीब 46 गांवों से लोग पहुंचे थे।

इससे पहले मुठभेड़ के दौरान अनंतनाग और कुलगाम जिलों के दर्जनों गांवों से युवा मोटरसाइकिलों और गाड़ियों में मुठभेड़ स्थल पर पहुंचे और सुरक्षा बलों के साथ टकराव किया। इस दौरान दो स्थानीय नागरिकों की मौत भी हुई थी। रिपोर्ट यह भी है कि टकराव का फायदा उठाते हुए दो से तीन आतंकी मुठभेड़ स्थल से फरार भी हुए।

अधिकारी के अनुसार उन्हें दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ता है। आतंकियों के साथ लड़ने के साथ साथ उन्हें अब स्थानीय लोगों के प्रदर्शन का भी सामना करना पड़ता है। ऐसा ही कुछ पांपोर में हुई दो मुठभेड़ों के दौरान देखने को मिला। पिछले वर्ष फरवरी में हुई 48 घंटे लंबी मुठभेड़ में लोग पुलवामा, पांपोर आदि जगहों से मुठभेड़ स्थल की ओर आए थे, जिन्हें चार किलोमीटर दूर ही रोक दिया था। इसी तरह अक्तूबर 2016 में ईडीआई में हुई एक और मुठभेड़ के दौरान लोगों ने ऑपरेशन में खलल डालने की कोशिश की थी।

गौरतलब है कि लोगों द्वारा आतंकियों को फरार होने में मदद करने की रणनीति 90 के दशक में अपनाई जाती थी, जब आतंकवाद ने सिर उठाया था। लोगों में यह नया नया था, लेकिन बीच में यह ट्रेंड लुप्त हो गया, लेकिन यह अब एक बार फिर से शुरू हुआ है जो काफी चिंताजनक है। जानकारी के अनुसार यह ट्रेंड वर्ष 2011 में दोबारा शुरू हुआ, जब पुलवामा जिले में दो स्थानीय आतंकी मुठभेड़ में फंस गए थे।

लश्कर कमांडर अबू कासिम की अक्तूबर 2015 में हुई मौत के बाद लोगों का मुठभेड़ स्थलों और आतंकियों के जनाजों में जाने का चलन काफी बढ़ गया। कासिम के जनाजे में करीब 50,000 से अधिक स्थानीय लोग शामिल हुए थे। इसके बाद पुलिस की चिंता और बढ़ गई और फिर विदेशी आतंकियों के शव जनाजे के लिए नहीं सौंपने का फैसला लेना पड़ा।
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