- योजना में जम्मू, कठुआ, रियासी, उधमपुर, सांबा, पुंछ, किश्तवाड़, रामबन और राजोरी को किया गया शामिल
- बायो माइनिंग तकनीक का होगा इस्तेमाल, एजेंसियों से प्रस्ताव मांगे
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। जम्मू संभाग के 12 शहरी निकायों को बायो माइनिंग, जैव खनन और पुराने कचरे से मुक्ति मिलने जा रही है। शहरी स्थानीय निकाय निदेशालय ने जम्मू, कठुआ, रियासी, उधमपुर, सांबा, पुंछ, किश्तवाड़, रामबन और राजोरी जिलों के निकायों से 52,958 मीट्रिक टन (एमटी) कचरे के निपटान की योजना बनाई है। इसके लिए एजेंसी की चयन प्रक्रिया शुरू हो गई है।
संभाग के कई शहरी निकाय दशकों से एकत्रित हो रहे कचरे का बोझ ढो रहे हैं। इससे न सिर्फ शहर के आसपास का वातावरण प्रदूषित और दुर्गंध से भरा रहता है, बल्कि पर्यावरण पर भी असर पड़ रहा है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने इस संबंध में कड़ा रुख अपनाया है। स्वच्छता सर्वेक्षण के बीच निदेशालय का प्रयास निकायों को खूबसूरत दिखाने के लिए पुराने कचरे से निजात पाना है। पुराने कचरे को हटाने की यह प्रक्रिया एक साल में पूरी की जाएगी। इसके लिए निदेशालय ने बायो माइनिंग तकनीक अपनाने की तैयारी की है। इसके लिए एजेंसियों से प्रस्ताव मांगे गए हैं। निदेशालय के एक उच्च अधिकारी ने बताया कि पुराने कचरे को निपटाने की प्रक्रिया समय-समय पर चलती रही है।
पर्यावरण अनुकूल प्रक्रिया है जैव खनन
जैव खनन एक पर्यावरण अनुकूल प्रक्रिया है, जिसमें सूक्ष्म जीवों की सहायता से धातुओं को खनन से निकाले गए मिश्रण से अलग किया जाता है। इस तकनीक के कई लाभ हैं, जैसे कि यह पर्यावरण-अनुकूल है, पारंपरिक खनन विधियों की तुलना में सस्ती है और कचरे का प्रबंधन करने में मदद करती है। इस प्रक्रिया में पारंपरिक खनन की अपेक्षा कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है और यह विधि कई प्रकार के कचरे और मिश्रणों पर लागू की जा सकती है। हालांकि, जैव खनन की कुछ सीमाएं भी हैं, जैसे कि यह प्रक्रिया पारंपरिक खनन की तुलना में अधिक समय लेती है और सूक्ष्म जीवों के सही प्रबंधन की आवश्यकता होती है। साथ ही, जैव खनन की क्षमता कुछ धातुओं के लिए ही प्रभावी होती है और इसके लिए विशेष प्रकार के पर्यावरणीय परिस्थितियों की आवश्यकता होती है।