हाईकोर्ट ने कश्मीर हिंसा (2005 से 2012) से प्रभावित हुए लोगों पर आधारित डॉक्यूमेंट्री ‘द टैक्सचर्स ऑफ लॉस’ को बिना काटछांट के दिखाने की इजाजत प्रदान कर दी। कोर्ट ने कहा कि डॉक्यूमेंट्री में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
मुख्य न्यायाधीश जी.रोहिणी व न्यायमूर्ति जयंत नाथ की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि यह सच है कि कश्मीर में हिंसा का मुद्दा संवेदनशील है लेकिन इस डॉक्यूमेंट्री में ऐसा कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है जिससे सुरक्षा बलों का मनोबल कम हो या फिर देशद्रोह हो।
अदालत ने कहा डॉक्यूमेंट्री में हिंसा से प्रभावित परिवार के सदस्यों के साक्षात्कार हैं जिनमें उनके व्यक्तिगत बयान है। इन बयानों से न तो सुरक्षा बल हतोत्साहित हो सकते हैं न ही यह राष्ट्र विरोधी है। हिंसा में अपने परिजनों को खो देने वाले लोगों ने अपनी भावनाएं व्यक्त की है। यह मात्र वृत्तचित्र है।
खंडपीठ ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) द्वारा हाईकोर्ट के ही सिंगल जज के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका का निपटारा करते हुए यह फैसला दिया है। सिंगल जज ने अपने फैसले में डॉक्यूमेंट्री को सार्वजनिक स्क्रीनिंग के लिए जारी करने के लिए प्रमाणपत्र देने का निर्देश दिया था।