जम्मू। केसर की क्यारी में फिर से जन्नत महकाते हैं, समझना नहीं इसे मात्र जमीन का टुकड़ा, अगर भारत देह है तो कश्मीर है देश का मुखड़ा...। यह पंक्तियां वीरवार को युवा कवि उपेंद्र पांडेय ने जनरल जोरावर सिंह सभागार में व्यक्त कीं। मौका था गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य पर जम्मू यूनिवर्सिटी में करवाए दो दिवसीय जश्न-ए जम्हूरिया का। सम्मेलन के दूसरे दिन कवियों ने अपनी रचनाओं से खूब समां बांधा। कवि की हर पंक्ति और कविता पर तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही थी। वीरवार को कवि सम्मेलन के साथ ही दो दिवसीय कार्यक्रम का समापन हो गया।
कार्यक्रम में देश के प्रसिद्ध कवियों ने अपनी प्रस्तुतियों से जम्मू शहरवासियों की शाम को रंगीन बना दिया। कार्यक्रम में अन्य राज्यों के साथ जम्मू-कश्मीर के कवियों ने कविता पेश कर खूब वाहवाही लूटी। जगदीश सोलंकी, सुदीप भोला, सुनील जोगी, विष्णु सक्सेना के साथ कवयित्री चंचल डोगरा और प्रो. भुवन मोहिनी ने देशभक्ति, प्रेम, हास्य सहित विभिन्न काव्य रंगों से दर्शकों का मनोरंजन किया। मध्यप्रदेश के कवि सुदीप भोला ने राजनीति व्यंग्य, एंटी रोमियों फोर्स, हिंदी के महत्व, देश की आजादी में योगदान देने वालों की वीरता को अपनी कविता के माध्मय से उजागर किया। भड़क रहेे थे, जिनके मन में देश भक्ति के शोले... कितने सीधे, कितने सच्चे, कितने मन के भोले, दूल्हे जैसे लगते थे वह पहन बसंती चोले, अपनी दुल्हन आजादी है जाते-जाते वह बोले...कविता के माध्यम से कवि ने कार्यक्रम में देशभक्ति का रस पिरोया।