ज्यौड़ियां। खौड़ की पंचायत तरोटी के गांव तरोटी कैंप में रविवार को सरपंच बचन सिंह तथा लोगों के सहयोग से श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ किया गया। कथावाचक साध्वी सोनिया शर्मा ने कहा कि माता-पिता की सेवा में ही सबसे बड़ी भक्ति है। उनका आभार हम लोग कभी नहीं चुका सकते हैं। उनकी खुशी में ही संतान की खुशी होनी चाहिए।
साध्वी ने कहा कि माता-पिता संतान की खुशी के लिए दिन-रात मेहनत मजदूरी कर अपनी संतान को पालपोस कर बड़ा करते हैं। मां खुद गीले बिस्तर पर सोकर संतान को सूखी जगह सुलाती है। इसलिए माता-पिता की सेवा करने से कई संकट नजदीक नहीं आते। उन्होंने कहा कि मांस और शराब का सेवन नहीं करना चाहिए। इससे मनुष्य के सोचने की शक्ति में कमी होती है। हमें प्रेम से रहना चाहिए। हमें कभी भी अपने बच्चों के सामने भेदभाव की बातें नहीं करनी चाहिए। क्योंकि बच्चे के पहले गुरु माता-पिता ही हैं।
हमें कुदरत के बनाए हर प्राणी से प्रेम करना चाहिए। कहा भी गया है प्रेम ईश्वर है और ईश्वर ही प्रेम। जहां प्रेम है वहां प्रभु उपस्थित, इसमें संदेह नहीं, अधिक से अधिक प्राणियों से प्रेम करें। प्रेम को सेवा में रूपांतरित कर दें और सेवा को पूजा में। यह सर्वश्रेष्ठ साधना है। उन्होंने कहा कि प्रभु से प्रेम आप तभी कर पाएंगें जब आप प्रभु निर्मित हर चीज से प्रेम करोगे। प्रभु का प्रसाद प्रभु की कृपा सुनो। प्रभु की कृपा से बढ़कर कोई अन्य दौलत नहीं यह आप की वैसे ही रक्षा करती है, जैसे पलके आंखों की। इस आस्था के प्रति तनिक भी अविश्वास न करें यह जीवन की सासों की तरह प्रमाणिक है। कथा 19 मार्च तक जारी रहेगी।
वेद-विद्या रहित मनुष्यों को प्रभु भक्ति किस प्रकार मिलेगी
संवाद न्यूज एजेंसी
विजयपुर। राडा में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में प्रदीप शास्त्री ने कहा कि एक समय की बात है। नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादिक अठ्ठासी हजार ऋषियों ने पुराणवेत्ता श्री सूतजी से पूछा-हे सूतजी! इस कलियुग में वेद-विद्या रहित मनुष्यों को प्रभु भक्ति किस प्रकार मिलेगी। उनका उद्धार कैसे होगा। कोई ऐसा व्रत अथवा तप कहिए जिसके करने से थोड़े ही समय में पुण्य प्राप्त हो तथा मनवांछित फल भी मिले।
हमारी प्रबल इच्छा है कि हम ऐसी कथा सुनें। सूतजी ने कहा- हे वैष्णवों में पूज्य, आप सबने प्राणियों के हित की बात पूछी है। अब मैं उस श्रेष्ठ व्रत को बताऊंगा जिसे नारदजी के पूछने पर लक्ष्मीनारायण भगवान ने उन्हें बताया था। कथा इस प्रकार है, आप सब सुनें एक समय देवर्षि नारदजी दूसरों के हित की इच्छा से सभी लोकों में घूमते हुए मृत्युलोक में आ पहुंचे। यहां अनेक योनियों में जन्मे प्राय: सभी मनुष्यों को अपने कर्मों के अनुसार कई दुखों से पीड़ित देखकर उन्होंने विचार किया कि किस यत्न के करने से प्राणियों के दु:खों का नाश होगा। ऐसा मन में विचार कर श्री नारद विष्णु लोक गए। वहां श्वेतवर्ण और चार भुजाओं वाले देवों के ईश नारायण को, जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे तथा वरमाला पहने थे। देखकर स्तुति करने लगे। नारदजी ने कहा- हे भगवन, आप अत्यंत शक्ति से संपन्न हैं, मन तथा वाणी भी आपको नहीं पा सकती, आपका आदि-मध्य-अंत भी नहीं हैं। आप निर्गुण स्वरूप सृष्टि के कारण भक्तों के दुखों को नष्ट करने वाले हो। आपको मेरा नमस्कार है।