हीरानगर। कहते हैं पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है, लेकिन पाकिस्तान हमारा ऐसा पड़ोसी है जो सिर्फ नुकसान करता है। भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर जारी गोलाबारी के बीच राहत शिविरों में पहुंचे लोगों ने कुछ इस तरह अपना दर्द बयां किया।
उन्होंने कहा कि हमारी जान के साथ खिलवाड़ हो रहा है और हमारे बच्चों के भविष्य के साथ। एक सप्ताह हो चला है और अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे स्कूलों में ताले लटके हैं। इसके बाद दो महीने की छुट्टियां पड़ जाएंगी।
सीमावर्ती इलाके में बेहतरीन शिक्षा के कोई अन्य साधन भी नहीं, न ही कोई कोचिंग सेंटर हैं जहां पिछड़े सिलेबस को बच्चे पूरा कर पाएं। इन परिस्थितियों में रोजगार भी कहां से मिलेगा, जमीन तो पहले ही पाकिस्तान के रहमो करम पर काश्त की जाती है।
लोगों ने कहा कि बच्चे पढ़ नहीं पा रहे, जान सुरक्षित नहीं तो सरकार कैसे कह सकती है कि अच्छे दिन चल रहे हैं। बीते एक सप्ताह में अंतराष्ट्रीय सीमा पर गोलाबारी में तीन दर्जन से अधिक लोग हो चुके हैं और कई लोग गोलाबारी से जान गवां चुके हैं। क्या यही सरकार का सुशासन है?
समय पर नहीं दी जा रही सतर्क रहने की जानकारी
पलायन कर राहत शिविरों में आ रहे लोगों ने प्रशासन के इंतजाम पर भी कई सवाल उठाए। लोगों ने कहा कि पहले भी गोलाबारी हुआ करती थी लेकिन इस तरह अफरातफरी नहीं फैलती थी।
बॉर्डर यूनियन के नेता भारत भूषण ने कहा कि प्रशासन और सीमावर्ती लोगों के बीच बेहतर तालमेल नहीं होने के कारण लोगों को अधिक परेशान होना पड़ रहा है। पहले जब ऐसे हालात बनते थे तो प्रशासन समय रहते लोगों को सतर्क कर देता था और सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जाता था।
लेकिन इस बार लोगों ने जान जोखिम में डालकर अपने परिवार को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है। प्रशासन के ज्यादातर इंतजाम फेल होते दिखे। शिवरा में पानी और खाने का इंतजाम कर देने से लोगों की हर परेशानी हल नहीं होती।
समय रहते लोगों को सूचित किया जाए तो वह घरों से सुरक्षित निकल भी सकते हैं और मवेशियों को भी सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा सकते हैं। शिविर में रह रहे हैं मुकेश शर्मा ने कहा कि यहां आने वाले लोगों के लिए प्रशासन की ओर से किए गए इंतजाम नाममात्र के हैं।
आम लोगों ने बढ़ाया मदद का हाथ
सीमा से पलायन कर शिविरों में आए ग्रामीणों की सहायता के लिए आम लोग भी खुलकर सामने आए। हीरानगर स्कूल में आए शरणार्थियों के लिए स्थानीय लोगों ने पानी और खाने का इंतजाम किया।
कई गैर सरकारी संस्थाएं भी इनकी मदद करने यहां पहुंचीं और खाने-पीने का सामान देकर इनकी सहायता की। स्थानीय संस्था शक्तिपुंज के कार्यकर्ता लोगों के बीच दिन-रात बने हुए हैं और हर जरूरत को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं।