केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण ने जल शक्ति विभाग के 2012 के आदेश को किया रद्द
कहा - ऐसा करना कर्मियों के अधिकारों को नियंत्रित करने वाले मानदंडों के विपरीत
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) ने जल शक्ति विभाग के साल 2011 के आदेश को रद्द करते हुए कहा है कि कर्मचारियों के अधिकारों का उल्लंघन करने वाली प्रथा शुरू करके सरकार ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया है। पंचायतों द्वारा उपस्थिति प्रमाण-पत्र की अनिवार्यता को लागू करना पंचायती राज संस्थाओं को नियंत्रित करने वाले कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत उचित नहीं ठहराया जा सकता।
साल 2011 में जल शक्ति विभाग द्वारा एक आदेश जारी किया गया। इसके तहत जल आपूर्ति योजनाओं के रखरखाव के लिए जिम्मेदार फील्ड कर्मचारियों का मासिक वेतन केवल संबंधित पंचों और सरपंचों द्वारा प्रमाणित उपस्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने पर ही जारी किया जाएगा। इस आदेश में खिलाफ पीएचई कर्मचारी एसोसिएशन, उधमपुर ने हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की। एसोसिएशन ने हाईकोर्ट में दावा किया कि इस आदेश का कर्मचारियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
मामले की सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कहा गया कि ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में कर्मचारियों की अनुपस्थिति के कारण नियमित रूप से पानी की आपूर्ति पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इन क्षेत्रों में अपर्याप्त जनशक्ति के कारण विभागीय नियंत्रण सीमित है। ऐसे इलाकों में कर्मचारियों की निगरानी और निरीक्षण से संबंधित चुनौतियों को दूर करने के लिए यह आदेश जारी किया गया था। उपस्थिति प्रमाण पत्र जूनियर इंजीनियरों द्वारा ही जारी किया जाएगा।
सरपंच द्वारा सत्यापन केवल यह पुष्टि करने के लिए है कि जूनियर इंजीनियर द्वारा जारी उपस्थिति प्रमाण पत्र सही है।मामले का फैसला सुनाते हुए कैट के न्यायिक सदस्य राजिंदर सिंह डोगरा ने कहा कि सरपंचों द्वारा सत्यापित उपस्थिति प्रमाण पत्र की आवश्यकता अवैध है। यह आदेश कैबिनेट के निर्णयों से ठीक विपरीत है, जो स्पष्ट रूप से पंचायतों की शक्तियों को सीमित करते हैं।