- मानवाधिकार आयोगों की बहाली को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर कोर्ट ने पहले लगाई थी फटकार
- सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हाईकोर्ट ने माना माफीनामा सच्चा, कहा- अब टिप्पणियां भविष्य में नहीं पढ़ी जाएंगी
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक अधिवक्ता को बड़ी राहत दी है। अदालत ने अपने पुराने आदेश में की गई कड़ी टिप्पणियों को हटाते हुए कहा कि अधिवक्ता की ओर से मांगी गई बिना शर्त माफी सच्ची और ईमानदार है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद हाईकोर्ट ने माना कि यह मामला अनुभव की कमी और सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा था इसलिए टिप्पणियों को अब भविष्य में उनके खिलाफ नहीं पढ़ा जाएगा।
मामला वर्ष 2021 का है। जम्मू के रहने वाले विधि स्नातक निखिल पाधा ने जनहित याचिका दाखिल कर जम्मू-कश्मीर मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, जवाबदेही आयोग और राज्य सूचना आयोग को दोबारा शुरू करने की मांग की थी। उनका कहना था कि इन आयोगों के बंद होने से आम लोगों की शिकायतें लंबित पड़ी हैं।
उस समय हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता किसी के इशारे पर राजनीतिक उद्देश्य से कोर्ट आ रहे हैं। अदालत ने सख्त टिप्पणियां करते हुए उन पर दस हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था। इसके बाद निखिल ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर 2022 में निर्देश दिया कि वह हाईकोर्ट में बिना शर्त माफी पेश करें और अगर माफी सच्ची पाई जाए तो कोर्ट उनके भविष्य को देखते हुए सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाए।
निर्देश के बाद निखिल ने हाईकोर्ट में शपथपत्र देकर माफी मांगी और कहा कि उस समय वे नए कानून स्नातक थे तथा अनुभव की कमी और भाषा की सीमाओं के कारण याचिका का मसौदा सही ढंग से तैयार नहीं कर पाए। हाईकोर्ट ने कहा कि निखिल अब अधिवक्ता हैं और उन्होंने सच्चे मन से अपनी गलती स्वीकार की है। अदालत ने माना कि यह गलती उत्साह और अनुभव की कमी के कारण हुई। इसलिए आदेश के कुछ हिस्सों से की गई टिप्पणियां हटा दी गईं।