अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के एक कांस्टेबल को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दिए जाने के फैसले को सही ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी सैन्य बल में अनुशासन सर्वोपरि होता है। बार-बार अनुशासनहीनता करने वाले कर्मचारी को सेवा में बनाए रखना उचित नहीं है।
बीएसएफ में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत रहे रतन लाल ने अपनी अनिवार्य सेवानिवृत्ति को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की थी। रतन लाल 16 सालों तक यूनिट रिपेयर संगठन में वेल्डर के रूप में सेवा दे चुके थे। इस दौरान उन्हें 15 बार नकद पुरस्कार भी मिले, लेकिन छह बार अनुशासनहीनता के आरोप में दंडित भी किया गया।
इनमें ड्यूटी के दौरान शराब पीना, निर्धारित अवकाश से अधिक समय तक अनुपस्थित रहना और वरिष्ठ अधिकारी से अभद्र भाषा का प्रयोग करना शामिल था। 2003 में एक बोर्ड ऑफ ऑफिसर्स ने उनके आचरण की समीक्षा की और उन्हें चेतावनी दी कि यदि उनका व्यवहार नहीं सुधरा तो उन्हें सेवा से हटा दिया जाएगा। लेकिन इसके बावजूद उनकी अनुशासनहीनता जारी रही, जिसके कारण 31 जुलाई 2006 को उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई।
मामले की सुनवाई के बाद फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश रजनीश ओसवाल की एकलपीठ ने कहा कि उन्होंने कहा कि बीएसएफ नियम 1969 के नियम 26 के तहत, यदि कोई कर्मी सेवा के योग्य नहीं पाया जाता, तो उसे सेवानिवृत्त किया जा सकता है। बशर्ते उसे पहले अपनी सफाई देने का अवसर दिया गया हो।
इस मामले बीएसएफ ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति से पहले पूरी प्रक्रिया अपनाई थी। याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस दिया गया था, जिसका उसने अपना जवाब भी दिया। इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि पहले मिली सजाएं उनके सेवा रिकॉर्ड की समीक्षा करने से नहीं रोकतीं। अनुशासनहीनता की घटनाएं बार-बार हुईं, इसलिए अधिकारियों के पास उन्हें सेवा से हटाने का पूरा अधिकार था।