नाबालिग के अपहरण और हत्या के आरोप में ट्रायल का सामना कर रहे तीरथ सिंह (कच्चा नलथी) को भद्रवाह के प्रिंसिपल सेशन जज संजीव गुप्ता ने फांसी की सजा सुनाई है।
जज ने डीजीपी के राजेंद्रा को निर्देश दिए कि भद्रवाह थाने के तत्कालीन एसएचओ संजय मन्हास के खिलाफ अपने कर्तव्य का निर्वाह सही तरीके से नहीं किए जाने के लिए सेवा नियमों के तहत कार्रवाई की जाए।
कोर्ट ने कहा कि एसएचओ ने केस के ट्रायल के दौरान एफएसएल रिपोर्ट पेश करने में देरी की और डीएनए टेस्ट तक नहीं करवाया। साथ ही जेएंडके स्टेट लीगल सर्विसेज अथारिटी के सदस्य सचिव को निर्देश दिए कि एक माह के अंदर पीड़ित परिवार को मुआवजे के रूप में दो लाख रुपये प्रदान किए जाएं।
पुलिस केस के अनुसार मृतक के पिता ने दर्ज शिकायत में कहा कि तीन जुलाई 2013 की शाम छह बजे वह अपनी पत्नी और दोनों बच्चो के साथ खेतो से पशुओं को वापस लाने गया था।
इसी दौरान गांव में स्थित पर्यटन विभाग की दुकान पर पांचवीं में पढ़ने वाली बेटी कुरकुरे लाने गया। इसी दौरान आरोपी बच्चे से मिला और उसे कुरकुरे का पैकेट व पानी की बोतल दी। विभाग के दुकानदार ने बच्चे को घर जाने के लिए कहा, लेकिन आरोपी ने उसे वापस जाने से रोका।
उसके बाद से ही बच्चा लापता रहा। तमाम कोशिशों के बावजूद बच्चे का पता नहीं चला। पुलिस की कड़ी पूछताछ के दौरान आरोपी टूट गया और उसने स्वीकार किया कि बच्चे के साथ दुष्कर्म करने के बाद उसकी हत्या कर दी थी।
प्रिंसिपल सेशन जज ने पीपी मंजू शर्मा, भावना शर्मा के अलावा आरोपी के वकील आईए हमाल तथा सुमित कोतवाल की दलीलें सुनने के बाद पाया कि वकीलों द्वारा केस की गंभीरता कम करने की परिस्थितियां पैदा करने की कोशिश की हैं, लेकिन न्याय पूर्ण रूप से आरोपी के खिलाफ ही जाता है।
जिस निर्ममता से घटना को अंजाम दिया गया, उसे ध्यान में रखते हुए न्यायपालिका की जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए विश्व को रहने योग्य बनाएं।
इस तरह के केस दुर्लभ होते हैं और इनमें मौत की सजा से कम की गुंजाइश नहीं बनती। अदालत ने आरोपी को धारा 302 का दोषी मानते हुए उसे फांसी पर लटकाने की सजा सुनाई।
इसके अलावा दोषी को अन्य धारा में सात साल की सजा और दो हजार रुपये जुर्माना लगाया गया। जुर्माना अदा न करने पर उसे चार माह की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी।