हाईकोर्ट ने एक रिट याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि आपराधिक केस से बरी होना बहाली का आधार नहीं हो सकता। यह आदेश अदालत ने सेंट्रल बैंक आफ इंडिया की ओर से दायर एक एलपीए की सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें बैंक कर्मचारी को बर्खास्त करने के रिट कोर्ट के आदेश को खारिज करने की अपील की गई थी।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एन पाल वसंथाकुमार और न्यायाधीश बंसी लाल भट की खंडपीठ ने पाया कि मुलाजिम भरोसे और विश्वास के पद पर तैनात था। उसने पद का दुरुपयोग करते हुए भरोसा तोड़ने का कृत्य किया।
उसे नौकरी पर फिर से बहाल किया जाना अन्य कर्मियों के लिए शर्मनाक और नियोक्ता के लिए असुविधाजनक होगा। आरोपी बैंक में काम करता था, जहां जनता के पैसे की डीलिंग होती है। उसने ऐसा कृत्य कर बैंक का विश्वास तोड़ा।
अदालत ने पाया कि विभागीय जांच के दौरान उसे अपना पक्ष रखने के कई अवसर दिए, लेकिन आरोपी जांच अधिकारी के समक्ष उसे रखने में असफल रहा और अवसरों का लाभ नहीं उठा सका। अदालत ने कहा कि याची यह नहीं कह सकता कि उसे पक्ष रखने का अवसर प्रदान नहीं किया गया।
उसके पक्ष में सिर्फ एक बात है कि उसे आपराधिक केस से बरी कर दिया गया। खंडपीठ ने कहा कि यदि निलंबन अवधि के दौरान याची को कोई जीवन निर्वाह का खर्च नहीं दिया हो तो उसे आठ सप्ताह के अंदर अदा किया जाए।