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लद्दाख में जलवायु परिवर्तन का गंभीर असर: सरक रहे ग्लेशियर, बढ़ रहा झीलों का आकार, बाढ़ का बढ़ा खतरा

Fri, 20 Mar 2026 12:15 PM IST
Nikita Gupta प्रवेश कुमारी अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

लद्दाख में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे प्रो-ग्लेशियल झीलों का आकार बढ़ रहा है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि इन झीलों के टूटने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जैसी विनाशकारी बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
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लद्दाख में ग्लेशियर पिघलने से बनी झील। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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लद्दाख में जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर तेजी से पिघलने के साथ पीछे हट रहे हैं। इससे हिमनद झीलों का आकार बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों ने पदम और नेटियो नाला ग्लेशियरों पर अध्ययन के बाद निकट भविष्य में प्रो-ग्लेशियल झीलों का अपस्ट्रीम यानी ऊपर की तरफ विस्तार होने की आशंका जताई है।

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प्रो-ग्लेशियल झील पिघलते हुए ग्लेशियर के सामने या उसके पीछे हटने के दौरान मलबे से बनती है। बर्फ से बने बांध की वजह से पानी रुक जाता है। जब यह बांध टूटता है तो ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जैसी विनाशकारी बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। लद्दाख की पदम घाटी पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों में से एक वाडिया हिमालयन भूविज्ञान संस्थान के डॉ. मनीष मेहता बताते हैं कि ये प्रो-ग्लेशियल झीलें बहुत प्रतिक्रियाशील होती हैं। इनकी हिमनद झीलों के साथ होने वाली क्रिया और मूल ग्लेशियरों के अंतिम छोर (टर्मिनस) ये दोनों मिलकर इस बात पर असर डालते हैं कि आने वाले दशकों में ग्लेशियर कितना पीछे हटते हैं और कितना द्रव्यमान खोते हैं।

यह शोध प्रतिष्ठित पत्रिका प्रोग्रेस इन फिजिकल जियोग्राफी में छपा है। इसमें डॉ. मनीष मेहता के साथ डॉ. अजय सिंह राणा व डॉ. विनीत कुमार भी शामिल रहे हैं। डॉ. मनीष मेहता कहते हैं कि यह अध्ययन अभी चल
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 रहा है। इसके निर्णायक नतीजे और चौंकाने वाले हो सकते हैं।

ग्लेशियरों की गति दर में भी दर्ज की गई कमी
लद्दाख के दो ग्लेशियरों पर हुए अध्ययन में झील और जमीन पर खत्म होने वाले ग्लेशियरों की बहाव दर में क्रमशः 66 और 47 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। वैज्ञानिकों ने अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल कर ग्लेशियर के द्रव्यमान (वर्ष 2000 से 2021 तक) का अध्ययन किया और पाया कि पदम व नेटियो नाला ग्लेशियरों के लिए यह क्रमशः -0.22 ± 0.07 और -0.52 ± 0.07 मीटर प्रतिवर्ष था। इससे झील पर खत्म होने वाले ग्लेशियरों के अत्यधिक प्रतिक्रियाशील होने की बात साबित हुई।
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प्रो-ग्लेशियर झील के प्रभाव को समझने के लिए अध्ययन :
ग्लेशियर की स्थिरता पर प्रो-ग्लेशियर झील के प्रभाव और इसके द्रव्यमान को प्रभावित करने वाले कारकों को बेहतर ढंग से समझने के लिए वैज्ञानिकों ने पदम और नेटियो नाला ग्लेशियर से सटे हिस्से पर शोध किया। ये वो जगह थीं जहां से ग्लेशियर पीछे हट चुका था। उन्होंने पाया कि ग्लेशियर के अंतिम छोर का हिमनद से संपर्क होने पर ग्लेशियर अधिक तेजी से पीछे हटा है।

1993 से लेकर 2022 तक के आंकड़ों का किया विश्लेषण :
वैज्ञानिकों ने बेहतर नतीजे के लिए वर्ष 1993 से 2022 तक के जगह छोड़ चुके ग्लेशियरों पर अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि पदम और नेटियो नाला ग्लेशियरों का क्षेत्रफल क्रमशः 28.61 से घटकर 25.29 वर्ग किलोमीटर और 29.79 से घटकर 28.20 वर्ग किलोमीटर हो गया। इसी अवधि में झील पर खत्म होने वाला ग्लेशियर पीछे हटा। 29 साल की इस अवधि में प्रो-ग्लेशियर झील के क्षेत्रफल में 0.35 से 0.56 वर्ग किलोमीटर तक की स्पष्ट वृद्धि देखी गई।
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