केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (सीएटी) ने जम्मू और कश्मीर लोक सेवा आयोग को निर्देश दिया है कि वह कम से कम सात उम्मीदवारों को जम्मू-कश्मीर संयुक्त प्रतियोगी मेन्स परीक्षा, 2024 में अस्थायी रूप से भाग लेने की अनुमति दे।
एमएस लतीफ (सदस्य-न्यायिक) और प्रशांत कुमार (सदस्य-प्रशासनिक) की पीठ ने पक्षकारों के वकीलों को सुनने, सामग्री का अवलोकन करने और जम्मू सीएटी बेंच द्वारा पारित एक आदेश, जिसमें अन्य उम्मीदवारों को समान राहत दी गई थी, को ध्यान में रखते हुए यह आदेश पारित किया।
पीठ ने कहा, “आदेश देते हैं कि प्रतिवादी (जेकेपीएससी) याचिकाकर्ताओं को जम्मू-कश्मीर संयुक्त प्रतियोगी मेन्स परीक्षा, 2024 में अस्थायी रूप से भाग लेने की अनुमति देगा और प्रतिवादी उनके आवेदन पत्र स्वीकार करेंगे।”
जेकेपीएससी ने अपनी आपत्तियों में कहा कि जम्मू और कश्मीर लोक सेवा आयोग परीक्षा संचालन नियम, 2022 के नियम 10-सी के तहत, सामान्य अध्ययन पेपर-I और पेपर-II के लिए अस्थायी उत्तर कुंजी 23 फरवरी 2025 को जेकेपीएससी की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड की गई थी और परीक्षा के तुरंत बाद, उम्मीदवारों से तीन दिनों के भीतर आपत्तियां मांगी गई थीं।
आयोग ने बताया कि विशेषज्ञों ने कुछ उत्तरों में बदलाव की सिफारिश की थी और जेकेपीएससी ने नियमों और स्थापित प्रक्रिया के अनुसार इन सिफारिशों को स्वीकार किया और अंतिम उत्तर कुंजी अधिसूचित की। जेकेपीएससी ने तर्क दिया कि अंतिम उत्तर कुंजी के आधार पर उम्मीदवारों की मेरिट स्थिति में बदलाव को मनमाना या दुर्भावनापूर्ण नहीं कहा जा सकता और प्रारंभिक उत्तर कुंजी को स्पष्ट रूप से ‘अस्थायी’ के रूप में अधिसूचित किया गया था, जो आपत्तियों और समीक्षा के अधीन थी।
जेकेपीएससी के वकील ने पीठ द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या याचिकाकर्ताओं (सात उम्मीदवारों) द्वारा दायर प्रतिनिधित्व का निपटारा किया गया है या नहीं, कहा कि 2022 के नियमों के 10-सी के तहत परीक्षा संचालन में अंतिम समीक्षा के लिए कोई प्रावधान नहीं है और अंतिम रूप से जारी उत्तर कुंजी को स्पष्ट रूप से अंतिम उत्तर कुंजी के रूप में अधिसूचित किया गया है। वकील ने कहा कि किसी भी याचिकाकर्ता ने 2022 के नियमों के 10-सी के तहत निर्धारित तरीके से आपत्तियां दायर नहीं कीं, इसलिए इस स्तर पर उठाई गई आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह परीक्षा प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले नियमों के विपरीत है।
दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील अस्वद अत्तर ने तर्क दिया कि केवल निर्धारित प्रारूप में प्रतिनिधित्व दायर न करने के आधार पर याचिकाकर्ताओं को उनके प्रतिनिधित्व के निपटारे के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि हमेशा पर्याप्त न्याय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, न कि तकनीकी न्याय को।