शिक्षा विभाग ने प्रतिबद्ध किया था कि कश्मीरी, डोगरी, पंजाबी और बोधि को कक्षा छह से आठवीं तक के अनिवार्य विषयों में से एक के रूप में पढ़ाया जाएगा, जहां ऐसी भाषाएं जम्मू, कश्मीर और लद्दाख प्रांतों में मातृभाषा के रूप में बोली जाती है। इसके बाद भी शिक्षा विभाग अभी तक स्कूल स्तर पर डोगरी को इतनी अहमियत नहीं दिला पाया जितनी आवश्यकता थी।
"डोगरी भाषा में बाल साहित्य की कमी है, जिसके चलते विद्यार्थियों में से डोगरी पढ़ने की रुचि खत्म हो जाती है। इसी के साथ जो स्कूलों में डोगरी का पाठ्यक्रम शामिल किया जाता है, वो भी सही ढंग से नहीं बनाया जाता। जिन्हें डोगरी के बारे में जानकारी नहीं है वह डोगरी का अच्छा पाठ्यक्रम कैसे बना सकते हैं। सरकार भी डोगरी भाषा के प्रति गंभीर नहीं है। मुझे लगता है कि यह माता-पिता का फर्ज है कि वह अपने बच्चों को डोगरी बोलने के लिए प्रेरित करें और उनके साथ डोगरी का प्रयोग भी करें। हम किसी भी भाषा को देख लें हर कोई बड़े ही गर्व के साथ अपनी भाषा में बात करता है लेकिन सिर्फ डोगरे ही हैं जो डोगरी बोलने में शर्म महसूस करते हैं।"- सुरजीत होश बडसली, डोगरी लेखक