सालों से मुआवजे की राह देख रहे अरनिया सेक्टर के सीमावर्ती गांवों के लोगों की उम्मीदें अब टूटने लगी हैं। पिछले साल सितंबर में आई भीषण बाढ़ और पाकिस्तानी गोलाबारी में कई परिवार अपना सबकुछ खो चुके हैं। परेशान ग्रामीण कहते हैं कि इंतजार की डोर कितनी लंबी खिंचेगी, यह कहना मुश्किल है। फिलहाल, वह किसी तरह अपने परिवार की गाड़ी खींच रहे हैं।
कारगिल युद्ध के दौरान अरनिया सेक्टर में तकरीबन 84 कनाल उपजाऊ भूमि सेना ने इस्तेमाल के लिए ली थी, इसका मुआवजा अब तक नहीं मिला। वर्ष 2008 में भयंकर ओलावृष्टि हुई थी, तब धान की फसल बर्बाद हो गई थी। पिछले साल सितंबर के पहले सप्ताह में भीषण बाढ़ ने फसलों को तबाह कर दिया था।
ग्रामीणों के घर बह गए थे, लेकिन मुआवजा तो दूर, ठीक से सुध तक नहीं ली गई। इस सबके बीच पाकिस्तानी गोलाबारी आए दिन सीमावर्ती ग्रामीणों को घरबार छोड़ने को मजबूर कर देती है। गोलाबारी में अरनिया सहित सीमावर्ती गांवों के कई लोग मारे जा चुके हैं और कई घायल हुए हैं। इनके परिवारों के जख्मों पर भी मरहम नहीं लगाया गया।
राज्य और केंद्र सरकार से मुआवजे की आस
बम बम भोले मामले के पीडि़त भी राज्य और केंद्र सरकार से मुआवजे की आस लगाए हैं। सीमावर्ती ग्रामीणों को सुरक्षित स्थानों पर पांच-पांच मरले के प्लाट देने के वादे सियासी दलों ने न जाने कितनी बार किए, लेकिन अब तक मामला ढाक के तीन पात से आगे नहीं बढ़ा है। किसानों की काफी उपजाऊ जमीन तारबंदी के दायरे में है। इस पर खेती करना किसी जोखिम से कम नहीं है।
सीमावर्ती गांवों के मदनलाल, अजय कुमार, नरेश सैनी, बबला सैनी, अवतार सिंह आदि का कहना है कि सीमावर्ती ग्रामीणों सहित हम लोग वर्षों से मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं। उनका कहना है कि परेशान-हताश ग्रामीणों के लिए सीमावर्ती गांवों में रहना अब अभिशाप जैसा बन गया है।
अब तो आलम है कि सियासी दल सहानुभूति प्रकट करके लौट जाते हैं। पीडि़त लोग सियासी दलों की राजनीति में पिस रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि मुआवजा कब मिलेगा, इसका तो कोई पता नहीं, लेकिन मुआवजे की सूची जरूर लंबी होती जा रही है।