हाईकोर्ट की खंडपीठ ने बोर्ड आफ प्रोफेशनल एंट्रेंस एग्जाम (बीओपीईई) के अधिकारों पर मुहर लगा दी है। खंडपीठ ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया कि बेतुका सवाल और गलत विकल्प वाले सवाल हटाने का उसे पर्याप्त अधिकार है। बेतुका सवाल और गलत विकल्प की त्रुटियों को सुधारने के अधिकार का प्रावधान अधिनियम 2002 के सेक्शन 9(ए)(1) में है।
सात और आठ जून 2014 को बोर्ड की ओर से आयोजित कामन एंट्रेंस टेस्ट को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं की सुनवाई करते हुए जस्टिस मुजफ्फर हुसैन अत्तर और जस्टिस बंसी लाल भट की खंडपीठ ने उक्त आदेश दिया। आठ जुलाई 2014 को बोर्ड ने वेबसाइट पर उत्तर पुस्तिका डाउनलोड की थी। साथ ही प्रतिभागियों को अवसर दिया था कि यदि उसमें किसी तरह की त्रुटि है तो वह दो दिनों के अंदर अपना मत रख सकते हैं।
बोर्ड के अनुसार 276 प्रतिभागियों की ओर से उत्तर पुस्तिका के खिलाफ शिकायतें मिलीं। प्रतिभागियों की ओर से रखी शिकायतों को उनके सुझाव के साथ एक्सपर्ट कमेटी को भेजा। एक्सपर्ट कमेटी ने उनके सुझावों पर विचार किया और 17 सवालों को सुधारने और बायलॉजी व केमिस्ट्री के एक-एक सवाल के उत्तर को बदलने की अनुशंसा की। बोर्ड ने रिवाइज्ड उत्तर को वेबसाइट पर प्रदर्शित किया। उसी आधार पर रिजल्ट को भी सुधारा गया।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार निर्णय क्षमता के बिना लिया गया था और उसे सुधारना उचित नहीं था। खंडपीठ के लिए जस्टिस बंसी लाल भट की ओर से लिखे महत्वपूर्ण फैसले में लिखा कि सीईटी के रिकार्ड को देखने के बाद पता चला कि बोर्ड ने प्रतिभागियों के सुझाव व शिकायत मांगी। इसके लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया, जिसमें उक्त विषय के विशेषज्ञ व डोक्टोरेट और दस साल के शिक्षण अनुभव वाली शख्सियतों को रखा गया। विशेषज्ञों ने कुछ मामलों में सुधार के अपने सुझाव दिए।
बोर्ड ने उसी आधार पर निर्णय लिया। सब्जेक्ट एक्सपर्ट का फैसला अंतिम था और उस पर सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि जहां तक आवेदक के न्याय के संबंध में नियमों के गैर अनुपालन की शिकायत का सवाल है, वह निराशा में तर्क जैसा है। चयन प्रक्रिया में सुधार लाने के लिए ही बोर्ड ने प्रतिभागियों से उनकी शिकायतें पूछीं और उनका हल विशेषज्ञों की टीम से करवाया। तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए अदालत एलपीए को समाप्त करती है।