ट्रैफिक पुलिस की गलती से सड़क हादसे में जान गवां चुके सिद्धार्थ मट्टू के माता-पिता को बेटे को जिंदा देखना भी नसीब नहीं हो सका। सिद्धार्थ खुद पुणे के संजीवनी रूरल एजूकेशन सोसायटी कालेज आफ इंजीनियरिंग (कोपर गांव, जिला अहमद नगर, महाराष्ट्र) में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था, जबकि माता-पिता बिजनेस के सिलसिले में श्रीनगर में रह रहे थे।
छोटा भाई कुणाल जम्मू में अपनी दादी के साथ रहता है। परिवार के लोगों ने बताया कि सिद्धार्थ छुट्टी पर आया था और उसने 16 दिसंबर को ट्रेन से वापसी भी करनी थी। इसके लिए उसने ट्रेन में आरक्षण भी करवा लिया था, लेकिन शायद उसकी किस्मत में कालेज में दोबारा लौटना नहीं लिखा था।
सर्दी की छुट्टी पर जम्मू आए सिद्धार्थ मट्टू को आनंद नगर, बोहड़ी में अपनी दादी और भाई कुणाल के साथ रहते अभी चार दिन ही हुए थे कि मनहूस घड़ी ने उसकी जिंदगी छीन ली। कुणाल के साथ बैठकर बचपन की यादें ताजा करना भी अधूरा रह गया। लंबे समय तक किराये के मकान में रहने के बाद दो माह पहले ही आनंद नगर, बोहड़ी में अपना घर लिया था।
सिद्धार्थ का इरादा था कि पढ़ाई खत्म करके जम्मू में ही नौकरी करनी है। हादसे में अचानक हुई मौत से दादी, मां और पिता सदमे में हैं। उनके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। पिता की मायूसी उनके दिल और दिमाग पर लगी बेटे की मौत से गहरी चोट को उजागर कर रही थी। उनकी नम आंखें यहीं सवाल करती नजर आईं कि सिद्धार्थ कैसा घाव जिंदगी भर के लिए दे गया, जो किसी मरहम से भरने वाले नहीं हैं।
मां-बाप ने बड़े लाड़ प्यार से पाला, घूमाया, खिलाया, पिलाया। उसकी नादानियों को नजरअंदाज करते हुए अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया। उसका शव ले जाने की हिम्मत कैसे बन पाती। उसे बड़ा आदमी बनाने का सपना देखा था जो कि टूट गया।
रिश्तेदार अभी तक किसी को सहारा देने कि स्थिति में इसलिए नहीं थे, कि वे सिद्धार्थ की मौत के जिम्मेदार ट्रैफिक पुलिस कर्मियों को सलाखों के पीछे डालने के लिए प्रयासरत रहे और पुलिस से उलझ गए।