अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। डुग्गर प्रदेश का लोक संस्कृति का अभिन्न अंग माने जाने वाला बच्छ दुआ पर्व जिलेभर में श्रद्धाभाव व पारंपरिक तरीके से मनाया गया। महिलाओं ने संतान की दीर्घायु की मंगल कामना के लिए व्रत रखा। घरों में गुड़ और आटे की मीठी रोटियां बनाई। भिगोए हुए चने, मीठी रोटियां व फल लेकर नहर किनारे और मंदिरों में बच्छ दुआ की पूजा कर कथा सुनी।
शहर के कैनाल रोड में नहर किनारे, भगवती नगर में मंदिर सहित अन्य स्थानों पर बड़ी संख्या में महिलाएं व्रत पूजन के लिए पहुंचीं। पारंपरिक डोगरी वेशभूषा में महिलाओं व नवविवाहितों ने बच्छ दुआ की कथा सुनी और संतान की दीर्घायु के लिए प्रार्थना की। यह पर्व श्री कृष्ण जन्माष्टमी से चार दिन बाद मनाया जाता है। व्रत पूजने के बाद महिलाओं ने गाय और बछड़े की पूजा भी की। घर में गाय को स्नान करवाया और गले में फूलों की माला पहनाई। कुछ महिलाएं आज भी पर्व मनाएगी। कैनाल रोड नहर किनारे पहुंची महिलाओं ने कहा कि डुग्गर प्रदेश में पर्व का बड़ा महत्व है। व्रत के दो दिन पहले ही काले चने भिगो कर रखे जाते जिसे डोगरी में बिरड कहा जाता है। आटे के अंदर हल्दी डाल कर धागे को पीला रंग दिया जाता है। मीठे गुड़ की रोटी और पीले आटे से गाय, बछड़ा, बच्चे और जाटनी की मूर्ति बनाई जाती है। भगवती नगर मंदिर में महिलाओं ने सामूहिक रूप से पर्व को मनाया।
घर में जितने पुरुष उतने ही थाली में रोट
दोमाना। मढ़ और भलवाल ब्लॉक में भी पर्व की धूम रही। महिलाएं सुबह नहाकर नदी तथा नहरों के किनारे पूजा करने पहुंच गई। व्रत के दौरान देवस्थानों पर माथा टेका। मुट्ठी में नहर किनारे पूजा करने आई किरण वर्मा, रानी, रोहिनी, शोभा, गीता तथा सुषमा ने व्रत का महत्व बताया कि घर में जितने पुरुष एवं लड़के होते हैं उस हिसाब से रोट बनाकर उन्हें पूजा की थाली में चने एवं फलों के साथ रखा जाता है। फिर सभी महिलाएं नहरों किनारे ईष्टदेव की पूजा करती हैं। आमतौर पर व्रत निर्जल रखा जाता है और सूर्यास्त के बाद पूजा कर जल ग्रहण किया जाता है। मगर कुछ क्षेत्रों में महिलाएं फलाहार का सेवन करती हैं। दूसरे दिन सुबह कंजक पूजन के बाद रोट को प्रसाद के रूप में ग्रहण कर व्रत खोलती हैं। इसी तरह मिश्रीवाला में नहर किनारे आरती, स्नेहा, सीमा और नीरजा ने पूजा की। संवाद