श्रीनगर। रमजान का पाक महीना। पूरा दिन भूखा रहकर रोजा रखकर अपनी नफ्स (इच्छा) पर काबू पाना। महीना भर रोजा रखकर साल भर बुरे कामों से बचना, यही तो संकल्प लिया जाता है, इस पाक महीने में। बीएसएफ कांस्टेबल जिया-उल-हक और राणा मंडल ने भी बुधवार को रोजा रखा था। शहीद होने से पहले जिया-उल-हक और राणा मंडल मगरिब के बाद (सूर्य अस्त के बाद) श्रीनगर के बाहरी इलाके में सूरा में इफ्तारी यानी इफ्तार करने के लिए ब्रेड लाने गए थे। इस दौरान बाजार में बेकरी के नजदीक से गुजर रहे मोटरसाइकिल सवार आंतकियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। इसमें दोनों मौके पर ही शहीद हो गए और आतंकी भीड़भाड़ वाली गलियों से निकलते हुए भाग गए। पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (टीआरएफ) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है।
बीएसएफ की 37वीं बटालियन के जवानों ने कहा कि वे रोजा होने की वजह से पूरे दिन पानी की एक बूंद पिये बिना ही इस दुनिया से रुख्सत हो गए। जवानों ने अपने साथियों की मौत पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि वह बहुत जल्दी हमेशा के लिये अलविदा कह गए। साल 2009 में बीएसएफ में शामिल हुए हक के परिवार में माता-पिता, पत्नी नफीसा खातून और दो बेटियां... पांच साल की मूकबधिर बेटी जेशलिन जियाउल और और छह महीने की जेनिफर जियाउल हैं। वह मुर्शिदाबाद कस्बे से लगभग 30 किलोमीटर दूर रेजिना नगर में रहते थे। मंडल के परिवार में माता-पिता के अलावा एक बेटी और पत्नी जैस्मीन खातून है। वह मुर्शिदाबाद में साहेबरामपुर में रहते थे। दोनों जवान केन्द्र सरकार द्वारा 5 अगस्त को जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जा वापस लेकर उसे दो केन्द्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित करने के बाद से कश्मीर में तैनात थे। वे आगामी दिनों में आने वाला ईद का त्योहार भी नहीं मना सके।
बीएसएफ अधिकारियों ने वीरवार को कहा कि हक (34) और मंडल (29) पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के निवासी थे, दोनों दोस्त सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की 37वीं बटालियन से थे और पंडाक कैंप में तैनात थे। उनका काम नजदीकी गांदरबल जिले से श्रीनगर के बीच आवाजाही पर नजर रखना था। उन्होंने बताया कि मौत से कुछ ही मिनट पहले वे रोजा खोलने (इफ्तार) के लिए रोटी लेने गए थे। लेकिन वे इफ्तार नहीं कर सके और रोजे की हालत में ही शहीद हो गए।