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चीन सीमा पर तैनात सैनिकों के खाने के लिए डीआरडीओ ने विकसित की तकनीक 

Tue, 22 Sep 2020 09:15 PM IST
Mohit Mudgal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
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सर्दियों में एलएसी पर तैनात सेनिकों के लिए सब्जियां उगाने के लिए डीआरडीओं ने विकसित की तकनीक - फोटो : ANI
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भारतीय सेना एलएसी पर लंबी सर्दियों की तैयारी कर रही है। वहीं डीआरडीओ जवानों के लिए सब्जियों की खेती पर काम कर रहा है। जिन्हें आने वाले सर्दियों के मौसम में भारत-चीन सीमा पर तैनात सैनिकों के लिए उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए डीआरडीओ माइक्रोग्रीन तकनीक का इस्तेमाल कर रही है। 

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 डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च (डीहार) के वैज्ञानिक डॉ. दोर्जी ने बताया कि थल सेना बहुत कठोर स्थानों पर तैनात है। जहां पौधों के विकास के लिए उपयुक्त पर्यावरण मिलना मुश्किल है। इस माइक्रोग्रीन तकनीक से हमारे जवानों को ताजा और पोष्टिक भोजन मिल सकेगा। 



वहीं डीहार के निदेशक, डॉ. ओपी चौरसिया ने कहा कि हमारे पास भूमिगत ग्रीनहाउस भी हैं। एक दृष्टिकोण सर्दियों में सब्जियों के भंडारण तंत्र विकसित करने का है। यह एक शून्य ऊर्जा-आधारित भंडारण तकनीक है। जो 4-5 महीनों के लिए आलू, फूलगोभी और गाजर को स्टोर करने में मदद  करेगी।

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डीहार के निदेशक डॉ. ओम प्रकाश चौरसिया ने बताया कि यहां गर्मियों में डीआरडीओ हिल काउंसिल की मदद से सब्जियां उगाई जा सकती हैं। मगर अब हमारा मकसद सर्दियों में यहां सब्जियां उपलब्ध करना है। जिसके दो तरीके हैं, एक यहां ग्रीन हाउस तकनीक से खेती की जा सके। जिससे यहां जनवरी के महीने में भी टमाटर, फूल गोभी और आलू उगा सकेंगे। 

उन्होंने बताया कि यहां जीरो एनर्जी बेस्ड स्टोरेज तकनीक के जरिए गोभी, मूली गाजर को चार-पांच महीनों के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।

उन्होंने बताया कि यहां ऑक्सीजन का लेवल भी कम है और मौसम संबंधित कई परेशानियां हैं। जिसके चलते हमे ज्यादा पोषक सब्जियां और खाने की जरूरत है। हम ऐसी फसल की तैयारी कर रहे हैं जिसे आप कम खाएं लेकिन उसमें पोषक तत्व हो और यह ऊर्जा से भरपूर हो। 

पिछले साल अगस्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक पौधे का जिक्र किया था, जो लेह इलाके में मिला था, इसका नाम 'सोलो' है। जिसे संजीवनी के नाम से भी जाना जाता है। डॉ. चौरसिया ने बताया कि हिमालय जड़ी बूटियों का खजाना है। संजीवनी इन्हीं जड़ी बूटियों में से एक है। डीहार माइक्रोग्रीन पौधे पर काम कर रहा है जिसकी मदद से यहां के मौसम में भी खेती संभव होगी। डीहार की कोशिश है कि यहां  10-15 दिनों में फसल तैयार की जा सके। 

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