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Jammu News: हस्तनिर्मित पश्मीना की मांग में गिरावट से कारीगरों को सोजनी कढ़ाई के विलुप्त होने का डर

Thu, 11 Sep 2025 01:53 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू
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श्रीनगर। पश्मीना और तोशे शॉल पर सोज़नी कढ़ाई की सदियों पुरानी कला में भारी गिरावट आ रही है। कारीगरों ने चेतावनी दी है कि अगर तत्काल उपाय नहीं किए गए तो यह कला जल्द ही लुप्त हो सकती है।
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मध्य कश्मीर के बड़गाम ज़िले के गोटापोरा के तारिक अहमद (42) पिछले करीब दो दशक से अधिक समय से सोज़नी कढ़ाई का काम कर रहे हैं। अपने इलाके के वरिष्ठ कारीगरों में से एक माने जाने वाले तारिक का कहना है कि मशीनों से बनी नकल, सरकारी सहायता की कमी और बिचौलियों द्वारा शोषण के कारण प्रामाणिक हस्तनिर्मित कढ़ाई की मांग में भारी गिरावट आई है।
तारिक के अनुसार इस समय वर्तमान में हस्तनिर्मित पश्मीना की मांग में गिरावट के कारण कारीगरों को सोज़नी कढ़ाई के विलुप्त होने का डर है। उन्होंने बताया कि कारण यह है कि हस्तनिर्मित पश्मीना काफी महंगा होता है, जोकि एक आम खरीदार नहीं खरीद पाता है। इसलिए उसकी मांग में कमी के कारण काम में भी कमी आई है। इसके अलावा बाहरी राज्यों से बनकर आने वाली मशीनी कढ़ाई वाली शाल काफी सस्ती होती है, इससे भी हमारा काम प्रभावित हुआ है। लेकिन इन सब चुनौतियों के बावजूद हम इस सोज़नी कढ़ाई को बढ़ावा देने में अपना पूरा योगदान दे रहे हैं। कश्मीर की सोजनी (सुई) का काम दुनिया भर में प्रसिद्ध है लेकिन बाजार के बदलते रुझान के साथ यह शिल्प अस्तित्व के लिए लड़ाई लड़ रहा है। तारिक अहमद एक पुरस्कार विजेता सोजनी शिल्पकार हैं और मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ित हैं, जो एक दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल विकार है जो मांसपेशियों के अध: पतन का कारण बनता है। लेकिन अपने साथ 250 से अधिक शिल्पकारों के इस समूह को शुरू करने से उनकी स्थिति ने उन्हें पीछे नहीं हटाया।
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तारिक ने बताया कि उनका ''''स्पेशल हैंड्स ऑफ कश्मीर'''' कारीगरों का एक समूह है। इसमें वर्तमान में करीब 45 विशेष रूप से दिव्यांग हैं, मैं खुद 90 प्रतिशत दिव्यांग हूं लेकिन हम सोजनी के शिल्प को बढ़ावा देने और पुनर्जीवित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। अमर उजाला के साथ बात करते हुए तारिक ने कहा कि करीब 85 प्रतिशत कारीगर इस हस्तकला से दूर जा रहे हैं। युवाओं का इस ओर रुझान बहुत कम हो रहा है।
वहीं श्रीनगर के रैनावाड़ी के काठी दरवाजा निवासी 70 वर्षीय मोहम्मद असलम खान ने बताया कि उन्हें यह कला उनके चाचा मोहम्मद सुभान खान और उनके शिष्य अली मोहम्मद खान से विरासत में मिली थी। पीढ़ियों से हमारे परिवार ने इस परंपरा को जीवित रखा है लेकिन मेरे ज्यादातर रिश्तेदारों ने अब इसे छोड़ दिया है क्योंकि उन्हें आजीविका के अन्य स्रोत मिल गए हैं। हममें से कुछ ही इसे जारी रख पा रहे हैं हालांकि हमें संघर्ष करना पड़ रहा है। अपने लंबे अनुभव के चलते खान ने 200 से ज़्यादा कारीगरों को सोज़नी कला का प्रशिक्षण दिया है। इसके बावजूद उन्हें डर है कि युवा पीढ़ी अब इसे आगे बढ़ाने को तैयार नहीं है। उन्होंने बताया कि सोज़नी के लिए अत्यधिक धैर्य और महीनों की कड़ी मेहनत की जरूरत होती है। एक शॉल बनाने में सालों लग सकते हैं। लेकिन आज के युवा तेज़ और ज़्यादा मुनाफे वाले पेशों को पसंद करते हैं जबकि बाजारों पर मशीन से बनी प्रकृतियों का कब्जा होता जा रहा है।
खान कहते हैं कि असली पश्मीना पर असली सोज़नी कढ़ाई गुणवत्ता और सांस्कृतिक मूल्य में बेजोड़ है फिर भी कारीगरों को अपनी मेहनत के बदले बहुत कम मिलता है। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि बिचौलिए इस कला का शोषण करते हैं। वे हमारे काम को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऊंचे मुनाफे पर बेचते हैं जबकि हमें मुश्किल से अपना गुज़ारा करने लायक पैसा मिलता है। अपनी चिंता व्यक्त करते हुए खान ने सरकार से निर्णायक कार्रवाई करने की अपील की। उन्होंने कहा कि अभी नहीं तो कभी नहीं। अगर अधिकारी हस्तक्षेप नहीं करते, तो सोज़नी कढ़ाई सिर्फ यादों में ही बची रहेगी। पीढ़ियों की विरासत को पुनरुत्थान, सम्मान और मान्यता की ज़रूरत है। वरना, मशीन-निर्मित नकली कढ़ाई का बाज़ार सब कुछ मिटा देगा।
क्या होती है सोजनी कढ़ाई
सोजनी शॉल एक प्रकार की कश्मीरी शॉल है जो अपनी जटिल कढ़ाई के लिए जानी जाती है। यह कढ़ाई मुख्य रूप से पश्मीना या ऊनि कपडे पर की जाती है, जिसमें पतले धागों का उपयोग करके बारीक और विस्तृत डिज़ाइन बनाए जाते हैं। इस कढ़ाई में एक ही सुई का उपयोग किया जाता है, और इसमें साटन स्टिच, चेन स्टिच, हेरिंगबोन स्टिच और पारंपरिक कश्मीरी स्टिच जैसी विभिन्न प्रकार की सिलाई तकनीकों का उपयोग किया जाता है। इसके बारीक और विस्तृत डिजाइन शॉल को एक सुंदर और कलात्मक रूप देते हैं। इसकी एक अनूठी विशेषता यह है कि कपड़े के दोनों तरफ स्टिच एक जैसे होते हैं, जिसे दोरुखा कहते हैं। एक शॉल को बनाने में करीब एक महीने से दो साल तक का समय लग जाता है। और इसकी बाजार में कीमत 10 हज़ार से लेकर 5 लाख तक जाती है, क्योंकि यह एक बहुत ही श्रमसाध्य प्रक्रिया है। सोजनी कढ़ाई कश्मीरी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह एक पारंपरिक कला रूप है जिसे सदियों से संरक्षित किया गया है। यह कढ़ाई न केवल कश्मीरी महिलाओं द्वारा पहनी जाती है बल्कि दुनिया भर में भी प्रसिद्ध है।
यह है इतिहास
सोज़नी की कहानी कश्मीर और उसके लोगों की कहानी है। यह कला मध्यकाल में विशेष रूप से मुगल शासक अकबर के शासनकाल में अस्तित्व में आई, जिनका शॉल प्रेम अपने आप में एक ऐतिहासिक प्रेमकथा है। इस काल में शॉल बनाने की तकनीकें और कुशल कारीगर पर्शिया से लाए गए थे जहां शासकों और कुलीन वर्ग के शासनकाल में जटिल बारीकियों, प्रकृति से प्रेरित डिज़ाइन और शिल्प कौशल को बढ़ावा दिया गया था। भारत में, इन विधियों को पारंपरिक शैलियों से प्रेरणा मिली और सम्राट और उनके दरबारियों द्वारा इन्हें संरक्षण दिया गया।
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