जम्मू-कश्मीर सैलानियों के लिए ही नहीं, प्रवासी परिंदों को भी खूब भा रहा है। प्रदेश के 250 से ज्यादा वेटलैंड में वर्ष 2021 में इसके बीते साल की तुलना में ढाई लाख ज्यादा मेहमान परिंदे आए। जम्मू-कश्मीर में ठंड बढ़ते ही दिसंबर माह में प्रवासी परिंदों की आमद शुरू हो जाती है, जो सर्दी कम होने पर दूसरे इलाकों का रुख कर लेते हैं। पक्षी वैज्ञानिकों ने बीते साल गणना में ग्यारह लाख प्रवासी परिंदों की मौजूदगी पाई है। इनमें से साढ़े तीन लाख जम्मू और साढ़े सात लाख प्रवासी परिंदे कश्मीर संभाग के वेटलैंड में पहुंचे हैं। इससे पूर्व जम्मू-कश्मीर में वर्ष 2020 में कुल साढ़े आठ लाख मेहमान परिंदे पाए गए थे।
जम्मू-कश्मीर में जल पक्षी की 152 प्रजातियां
जम्मू विवि के पर्यावरण विभाग के विशेषज्ञ डॉ. नीरज शर्मा के अनुसार जम्मू-कश्मीर में जल पक्षी की 152 प्रजातियां इस समय भी प्रदेश के 250 से ज्यादा वेटलैंड में हैं। पिछले दो वर्षों के दौरान इस साल ढाई लाख ज्यादा परिंदों ने जम्मू-कश्मीर का रुख किया है। डॉ. नीरज शर्मा ने बताया कि जम्मू-कश्मीर इन प्रवासी परिंदों के फ्लाई जोन में आता है। यहां उन्हें पर्याप्त खाना और पड़ाव मिल जाता है। प्रवासी परिंदों की संख्या बढ़ना अच्छा संकेत है।
जम्मू-कश्मीर के ये हैं प्रमुख वेटलैंड
जम्मू में घराना, कुकड़िया, परगवाल, सुरुईंसर, मानसर, रंजीत सागर झील में प्रवासी पक्षी पाए जाते हैं। वहीं, कश्मीर संभाग में वुलर झील, मानस बल, डल झील व शालाबाग आदि स्थानों में ये पक्षी सबसे ज्यादा मिलते हैं। डॉ. नीरज ने बताया कि पक्षियों की अधिकांश संख्या (आईयूसीएन) इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर की रेड श्रेणी में आती हैं।
रामसर संधि में हुआ था वेटलैंड संरक्षण का फैसला
डॉ. नीरज शर्मा के अनुसार 2 फरवरी 1971 को हुई रामसर संधि में वेटलैंट संरक्षण का निर्णय लिया गया था। संधि में तय किया गया कि देश-विदेश से जो पक्षी जिन स्थानों पर जाते हैं, उनका वहां संरक्षण करना होगा। किसी प्रजाति के बीच में लुप्त होने से पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है।
छोटी झीलों और तालाबों को रखना होगा स्वच्छ
पक्षियों को सड़क निर्माण, अतिक्रमण, कीटनाशक, खरपतवार नाशक जैसे रसायन के इस्तेमाल से खतरा होता है। इसी वजह से वेटलैंड के वातावरण को प्राकृतिक अवस्था में रखने के प्रयास किए जाते हैं। छोटी झीलों और तालाबों को भी स्वच्छ रखना होगा।