मेल-मिलाप के नौ दिनों के भीतर ही पीडीपी और भाजपा में वैचारिक मतभेद चरम पर पहुंच गए हैं। पीडीपी कश्मीर में अपनी जमीन को मजबूत करने से एक कदम भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं, जबकि पीडीपी के साथ से भाजपा की हालत यह हो गई है कि उसे जम्मू के अलावा देश में अपनी जमीन खिसकने की चिंता सताने लगी है। ताजा विवाद में पीडीपी का यह बयान कि रोजमर्रा के मामलों में भाजपा से पहले बातचीत करने की जरूरत नहीं है, से विवाद और गहराने का खतरा बढ़ गया है।
पीडीपी के एमएलसी फिरदौस टाक का कहना है कि मसर्रत आलम की रिहाई में गृह मंत्रालय ने कानून का पालन किया है। सरकार के मसर्रत की रिहाई के फैसले का पीडीपी पूरी तरह समर्थन करती है और बचाव करती है। कोर्ट ने उसकी रिहाई के आदेश दिए हैं और सरकार ने उसका पालन किया है। उन्होंने कहा कि यह रोजमर्रा के मामले हैं। वह पहले भी कई बार गिरफ्तार और रिहा हो चुका है। ऐसे मामलों में भाजपा से पहले बातचीत किया जाना जरूरी नहीं है।
'मसर्रत को आउट आफ टर्न नहीं छोड़ा'
मसर्रत को और अधिक दिनों तक रोके रखने का कोई आधार नहीं है। उन्होंने कहा कि मसर्रत को आउट आफ टर्न नहीं छोड़ा गया है। घाटी में शांति प्रक्रिया की बहाली के लिए इस प्रकार का वातावरण तैयार किया जा रहा है। पीडीपी के मुख्य प्रवक्ता एवं शिक्षा मंत्री नईम अख्तर का कहना है कि जम्मू कश्मीर की समस्या का समाधान करने के लिए विश्वास बहाली की तरफ कदम तो उठाने ही पड़ेंगे। मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की अगुवाई में सरकार ने कश्मीर में विश्वास बहाली की तरफ जो कदम उठाया है, उस पर ज्यादा शोरशराबा करने से बात बनने के बजाय बिगडे़गी।
पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार को अपना काम करने देना चाहिए। भाजपा के महासचिव एवं विधायक राजीव जसरोटिया का कहना है कि भाजपा राष्ट्रवादी पार्टी है और कुछ भी ऐसा पीडीपी को नहीं करने देगी, जिससे देश और रियासत की सुरक्षा, एकता और अखंडता पर खतरा पैदा हो। मसर्रत की रिहाई से देश और रियासत में भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। पार्टी ने मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद को दो टूक शब्दों में कह दिया है कि केवल न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत ही सरकार चलाई जाए। पीडीपी की मनमानी बर्दाश्त नहीं होगी।