केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर के पहले उपराज्यपाल गिरीश चंद्र मुर्मू
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केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर के पहले उपराज्यपाल गिरीश चंद्र मुर्मू का प्रदेश में सफर महज 280 दिनों का ही रहा। 31 अक्तूबर 2019 को जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के तहत केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद उपराज्यपाल का पदभार संभालने वाले मुर्मू छह अगस्त 2020 को पदमुक्त हो गए। अल्प अवधि के इस कार्यकाल में कई उपलब्धियां और कई नाकामियां उनके हिस्से आईं।
जम्मू-कश्मीर में नागरिकता के लिए डोमिसाइल नियम तैयार करवाना और इसपर अमलीजामा पहनाना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। इसके अलावा एक देश एक टैक्स के सपने को साकार करने के लिए लखपुर से एक जनवरी से टोल पोस्ट हटाना भी उनकी उपलब्धि रही।
कोरोना काल में जम्मू-कश्मीर के इतिहास में पहली बार दरबार मूव की व्यवस्था में बदलाव और दोनों राजधानी शहरों श्रीनगर व जम्मू में नागरिक सचिवालय को खुला रखना भी उनके बेहतरीन निर्णयों में से एक है। जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम सुशासन सम्मेलन, 36 केंद्रीय मंत्रियों के दौरे होने के अलावा जम्मू कश्मीर के कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग का लाभ मिलना भी अच्छा रहा।
हालांकि, अफसरशाह की पृष्ठ भूमि से होने की वजह से वह जम्मू-कश्मीर के लोगों से घुल मिल नहीं पाए। प्रदेश में आईएएस अफसरों खासतौर से अहम पदों पर बैठे हुए प्रशासनिक सचिवों की बात हो या फिर प्रशासन को पूरी तरह से जवाबदेह बनाने में वह पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पाए। मुर्मू के रहते जम्मू-कश्मीर में कोई चुनाव भी नहीं हो पाए।
पंचायतों के सरपंचों, पंचों और बीडीसी के रिक्त पदों पर भी चुनाव की अधिसूचना जारी करने के बावजूद कई खामियों की वजह से अधिसूचना को वापस लेना भी उनकी ही नाकामी मानी जाएगी। वहीं वैश्विक औद्योगिक सम्मेलन को जम्मू-कश्मीर में करवाने के लिए करोड़ों की राशि खर्च करने के बावजूद इसे खराब समय ही कहा जाएगा कि वह सम्मेलन भी नहीं हो पाया। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर में चुनाव पर उनकी टिप्पणी पर चुनाव आयोग ने सख्त आपत्ति भी जताई।