विशेष न्यायाधीश प्रेम सागर ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि शादी समारोह के अनुष्ठान परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा भी संपन्न कराए जा सकते हैं। एनआईए की ओर से पेश हुए विशेष लोक अभियोजक ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। एनआईए ने तर्क दिया कि राथर दो गंभीर आतंकी मामलों में मुकदमे का सामना कर रहा है। उसकी रिहाई से वह अपने सहयोगियों के संपर्क में आ सकता है, गवाहों को प्रभावित कर सकता है या मुकदमे की प्रक्रिया में बाधा डाल सकता है।
इस पर अदालत ने आगरा सेंट्रल जेल के अधीक्षक को निर्देश दिया है कि वह पांच और छह सितंबर को सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे तक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (वीसी) के जरिये आरोपी की उपस्थिति दर्ज कराने के लिए व्यवस्था करें और इसका लिंक परिजनों को पहले से उपलब्ध कराएं। अदालत ने आरोपी के पिता की बीमारी से जुड़े कोई मेडिकल दस्तावेज पेश न किए जाने और सुरक्षा कारणों को ध्यान में रखते हुए अंतरिम जमानत की अर्जी खारिज कर दी।
10 दिन की अंतरिम जमानत की रखी थी मांग
वर्तमान में उत्तर प्रदेश की आगरा सेंट्रल जेल में बंद मोहम्मद इकबाल राथर ने पांच से 10 सितंबर तक 10 दिन की अंतरिम जमानत या हिरासत पैरोल की गुहार लगाई थी। राथर का तर्क था कि वह सात बहनों का अकेला भाई है और शादी के रीति-रिवाजों को पूरा करने के लिए उसकी मौजूदगी जरूरी है। उसने यह भी दावा किया था कि उसके पिता गंभीर पेट की बीमारी के कारण लंबे समय से बिस्तर पर हैं और घर में कोई अन्य पुरुष सदस्य नहीं है।
जैश आतंकियों को पनाह देने का है आरोप
अभियोजन पक्ष के अनुसार राथर ने जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी आशिक अहमद नेंगरू की मदद की थी और जम्मू-पठानकोट राष्ट्रीय राजमार्ग से आतंकवादियों को जम्मू-कश्मीर के विभिन्न इलाकों में पहुंचाया था। सितंबर 2018 में उसने तीन आतंकवादियों को बैन पुल के पास से रिसीव किया था, जिन्होंने बाद में झज्जर कोटली के पास पुलिस चेकिंग के दौरान गोलीबारी की थी। इसके अलावा वह पुलवामा हमले की मुख्य साजिश रचने वाले मोहम्मद उमर फारूक को रसद और सुरक्षित आवाजाही मुहैया कराने में भी शामिल रहा है।
आबकारी मामले में आरोपी को किया आरोपमुक्त
जिला न्यायिक मोबाइल मजिस्ट्रेट (टी) अदालत ने आबकारी अधिनियम से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी राजिंदर सिंह (निवासी मानसर) को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया है। अदालत ने यह फैसला 3 सितंबर 2026 को सुनाया, जिसमें पाया गया कि पुलिस ने गिरफ्तारी और जब्ती के दौरान कानून द्वारा तय जरूरी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया था।
मामले के अनुसार, 8 अप्रैल 2024 को पुलिस ने मानसर में आरोपी की दुकान पर छापेमारी कर डेढ़ बोतल व्हिस्की और चार खाली गिलास बरामद करने का दावा किया था, जिसके बाद उसके खिलाफ आबकारी अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के मुताबिक गिरफ्तार व्यक्ति और जब्त शराब को निकटतम एक्साइज इंस्पेक्टर के समक्ष पेश करना अनिवार्य होता है, लेकिन इस मामले में आरोपी को एक्साइज इंस्पेक्टर के सामने पेश नहीं किया गया था। केवल शराब की पहचान की रिपोर्ट ले लेना कानूनी प्रक्रिया का पूर्ण पालन नहीं माना जा सकता।
पीड़िता के मुकरने से आरोपी को जमानत नहीं, अन्य साक्ष्य अहम
जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने 15 वर्षीय नाबालिग के अपहरण और यौन उत्पीड़न के आरोपी माहिर अहमद खाचू की जमानत याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि सुनवाई के दौरान पीड़िता और उसके पिता के बयान से मुकरने मात्र से अभियोजन का मामला खत्म नहीं हो जाता और न ही यह जमानत देने का पर्याप्त आधार है, यदि अन्य ठोस साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद हो।
न्यायमूर्ति संजय परिहार की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि किसी गवाह या पीड़िता के हॉस्टाइल होने का अर्थ यह नहीं है कि उसके पूरे बयान को रिकॉर्ड से बाहर कर दिया जाए। बयान के वे हिस्से, जो अन्य उपलब्ध साक्ष्यों से मेल खाते हों, अदालत द्वारा विचार में लिए जा सकते हैं।
मामला 13 अप्रैल 2025 का है। परिमपोरा में सर्कस देखने गई नाबालिग लड़की संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गई थी और अगले दिन सुबह अपने किराए के मकान में लौटी थी। जांच में आरोप सामने आया कि उसे कार में ले जाकर बेमिना स्थित एक खाली मकान में यौन उत्पीड़न किया गया।
जांच के दौरान पुलिस को आरोपी द्वारा खरीदे गए खाने के यूपीआई भुगतान का इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, वाहन से मिले बाल तथा मेडिकल और फॉरेंसिक साक्ष्य मिले थे। आरोपी के खिलाफ परिमपोरा थाने में बीएनएस की धारा 137(2), 64, 65 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 3/4 के तहत मामला दर्ज है।
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि पीड़िता ने पहचान नहीं की और फॉरेंसिक रिपोर्ट में डीएनए का सीधा मिलान भी नहीं हुआ। अभियोजन ने मेडिकल, फॉरेंसिक, इलेक्ट्रॉनिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को मजबूत बताया। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हेमूदान नानभा गढ़वी बनाम गुजरात राज्य मामले का हवाला देते हुए निचली अदालत के जमानत से इनकार के फैसले को सही ठहराया। जेएनएफ