जम्मू-कश्मीर आपदा की दृष्टि से संवेदनशील प्रदेश है। पिछले साल सितंबर में आई बाढ़ को देखते हुए जलभराव की समस्या को हल करने के लिए युवाओं की एक टीम ने ईको-हाइड्रो-एआई प्लेटफॉर्म विकसित किया है। डिजाइन योर डिग्री की यह टीम “दुपहर” नाम से नेशनल हैकाथॉन में भी पहुंची, जहां इस मॉडल के लिए यह अव्वल रही। यह मॉडल एक स्वायत्त डिजिटल ट्विन सिस्टम है। ड्रेनेज इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने के लिए इसमें हाई-रिजोल्यूशन ड्रोन डाटा और भौतिकी पर आधारित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया गया है।
मौजूदा हाइड्रोलॉजिकल मॉडल इमारत के परिसर को प्राकृतिक इलाके से अलग नहीं कर पाता।
इससे बाढ़ का पानी प्राकृतिक ड्रेनेज वाले रास्तों के बजाय रिहायश वाली जगहों में भर जाता है। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर को काफी नुकसान होता है। लोगों की सेहत को खतरे के साथ ही 168.4 लाख टन फसलों का प्रतिवर्ष नुकसान होता है। ईको-हाइड्रो-एआई प्लेटफॉर्म इस सिस्टम की कमियों को तीन फेज वाले तकनीकी तरीके से ठीक करता है। पहले तरीके में यह मॉडल इमारतों के चबूतरे, पेड़-पौधों और कुदरती इलाकों के बीच फर्क करने के लिए सेल्फ-डिस्टिल्ड स्पेशल एनकोडिंग का इस्तेमाल करता है। पारंपरिक एल्गोरिदम की आम जियोमेट्रिक शॉर्टकट की गलतियों को दूर करता है।
दूसरे तरीके से यह प्लेटफॉर्म एक एक सरोगेट मॉडल का इस्तेमाल करता है।
इसे स्टॉर्म वॉटर मैनेजमेंट मॉडल बने सिंथेटिक सिमुलेशन पर ट्रेन किया गया है। यह नेटवर्क साफ तौर पर बड़े पैमाने पर बचाव और बुनियादी हाइड्रोलॉजिकल नियमों को लागू करता है। यह इमारत की सीमाओं के माध्यम से प्रवाह को प्रतिबंधित करता है। तीसरे यह आपातकाल में सेवाएं पहुंचाने के लिए बाढ़ग्रस्त, जोखिम वाले क्षेत्रों और सुरक्षित गलियारों की पहचान करने के लिए ट्रैफिक-लाइट जोखिम वर्गीकरण प्रणाली का उपयोग करता है। यह मॉडल मोहसिन हसन के साथ ही आदिल महाजन, तविषि अमला, गौरव शर्मा और नारायण चौधरी ने डेवलप किया है।
30 से 60 दिन नहीं...पांच सेकंड में तैयार होगी डीपीआर
यह एआई संचालित सिस्टम डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) को पूरा करने में लगने वाले समय को औसतन 30-60 दिनों से घटाकर लगभग पांच सेकंड कर देता है। इसके अतिरिक्त ग्रेविटी से चलने वाले पानी के बहाव के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने से आवश्यक सामग्री की लागत 30 प्रतिशत तक कम हो जाती है
फूल से केसर को अलग करने में मददगार बन रहा यह खास टूल
सर से स्टिग्मा को अलग करने के लिए एआई टूल का सहारा लिया जा रहा है। केसर में स्टिग्मा फूल का सबसे ऊपरी, पतला और गहरा लाल/नारंगी भाग होता है। यह केसर के धागे का वह हिस्सा है जिसे फूल से तोड़कर सुखाया जाता है। यह सुगंध और स्वाद प्रदान करता है। एक किलो केसर के लिए डेढ़ लाख फूलों के स्टिग्मा की आवश्यकता होती है। कश्मीर का केसर अपने रंग और सुगंध के लिए दुनिया भर में मशहूर है। खास तौर पर पंपोर के केसर की अलग ही बात है। इसे अलग करने के लिए केसर के फूल को एक कन्वेयर सिस्टम के माध्यम से एक हाईस्पीड मोनोक्रोम कैमरे के सामने ले जाया जाता है।
एक कंप्यूटर प्रोग्राम पृष्ठभूमि से फूल को अलग करने के लिए इमेज को प्रोसेस करता है और उसे एक काले व सफेद (बाइनरी) फॉर्मेट में बदल देता है। इसके बाद कटाव पता लगाने के लिए इमेज को प्रोसेस किया जाता है। इसे डंठल को हटाने के लिए लागू किया जाता है। केवल कोरोला (पंखुड़ियों) और शैली को छोड़ दिया जाता है। शेर-ए-कश्मीर कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कश्मीर के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. जमीन हुसैन एआई के जरिये केसर आदि की खेती में आधुनिक तरीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहे हैं।
प्रदेश की खूबसूरती से पर्यटकों को लुभा रहा
जम्मू-कश्मीर का पर्यटन विभाग भी पर्यटकों को एआई के जरिये यहां की खूबसूरती के दर्शन करा रहा है। हाल ही में मुंबई और विदेश में हुए टूरिज्म एक्सपो में उसने वीआर के जरिये वहां के लोगों को घाटी के खूबसूरत पर्यटन स्थलों की सैर कराई। इसका मकसद लोगों को यहां के अनछुए पहलू दिखा बड़े पैमाने पर लोगों को प्रदेश आने के लिए प्रेरित करना है।
अनुभव-एक्स: दर्शन कीजिए...लगेगा आप मंदिर में ही हैं
जम्मू की छात्राओं के एक ग्रुप ने अपने अनुभव-एक्स वर्चुअल रियलिटी मॉडल के जरिये प्रदेश के तीर्थस्थलों के दर्शन सुलभ कराए हैं। जम्मू को मंदिरों का शहर कहा जाता है। यहां से कुछ ही दूर पर मां वैष्णो देवी का मंदिर है जहां देश भर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। बहुत से बुजुर्ग ऐसे हैं जो अपनी उम्र, बीमारी या अन्य किसी दिक्कत की वजह से यहां आकर दर्शन नहीं कर पाते। ऐसे में उन्हें थ्री डाइमेंंशनल दृश्यों से वास्तविक अनुभव प्रदान करने के लिए यह प्लेटफॉर्म डेवलप किया गया है।
जम्मू विश्वविद्यालय की डिजाइन योर डिग्री की टीम अनुभव विधिता अरोड़ा, परिधि महाजन, दिया रानी और काशवी वैद ने यह वीआर मॉडल विकसित किया है। यह टेक-इनेबल्ड टूरिज्म को सक्षम बनाता है। लोगों को दूर बैठे 360 डिग्री वर्चुअल रियलिटी अनुभव प्रदान करता है।
कारीगरों की दिक्कतें दूर करेगा प्रोजेक्ट फिनिक्स
जम्मू-कश्मीर में हैंडीक्राफ्ट कारोबार अच्छे पैमाने पर होता है। उन्हें वैश्विक खरीदारों तक पहुंचाने के लिए आईआईटी जम्मू ने प्रोजेक्ट फिनिक्स शुरू किया है। हिंदी और अंग्रेजी न जानने वाले कारीगरों को खरीदार तक पहुंचाने में यह प्लेटफॉर्म मदद करेगा। प्रोजेक्ट हेड डॉ सोमा के अनुसार इस प्लेटफॉर्म पर कारीगर अपनी डिटेल साझा करेगा। किसी अन्य जगह बैठा व्यक्ति उसके बारे में जो भी सवाल भेजेगा वह कारीगर तक कश्मीरी में पहुंचेगा। वे बताते हैं कि यह प्रोजेक्ट दो वर्ष के भीतर क्रियाशील हो जाएगा।
व्हील चेयर ‘अधिरथ’ दूर करेगा दिव्यांगों की मुश्किलें
र्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) लोगों की मुश्किलें दूर करने में बेहद मददगार साबित हो रही है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) जम्मू की रोबोटिक्स विभाग की टीम ने एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संचालित एक व्हील चेयर विकसित की है जो दिव्यांगों की मुश्किलें दूर करेगी। सेंसर के जरिये यह दिव्यांगों की आवाजाही में मददगार बनेगी।
विकसित किए गए व्हील चेयर का नाम अधिरथ रखा गया है। प्रोटोटाइप को डेवलप करने में कुल 12 लाख रुपये की लागत आई है। पहले चरण में इसे अस्पतालों और हवाई अड्डों के लिए विकसित किया गया है। व्हील चेयर को विकसित करने के प्रोजेक्ट का नेतृत्व डॉ. नलिन शर्मा ने किया है। उनकी टीम में आकाश कुशवाहा और आमिर इकबाल शामिल रहे हैं। इस प्रोजेक्ट को एएनआरएफ यानी अनुसंधार रिसर्च फाउंडेशन की ओर से फंड प्रदान किया गया है। जल्द ही इसका कॉमर्शियल प्रोडक्शन आरंभ होने की उम्मीद है। नलिन बताते हैं कि इस व्हील चेयर को विकसित करने में उनकी टीम को दो साल का वक्त लगा है।