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विश्व फोटोग्राफी दिवस: झेलम की लहरों से शाही दरबार तक, महट्टा स्टूडियो बना बदलते कश्मीर का गवाह

Wed, 19 Aug 2026 02:16 PM IST
Nikita Gupta एचपी चौहान अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

श्रीनगर का ऐतिहासिक महट्टा स्टूडियो 1905 से कश्मीर के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलावों को तस्वीरों में संजोता आ रहा है। महाराजा हरि सिंह के दौर से 1947 के बंटवारे और बदलते श्रीनगर तक इसकी तस्वीरें कश्मीर की एक सदी से अधिक पुरानी कहानी का दस्तावेज हैं।
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वर्ष 1918 में झेलम के किनारे स्थापित महट्टा स्टूडियो में एक साथ तीनों भाई अमरनाथ मेहता, रामलाल मेहता - फोटो : गुलाम मोहम्मद सोफी
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विस्तार
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जम्मू-कश्मीर का इतिहास केवल किताबों और दस्तावेज में दर्ज नहीं है। वह हजारों तस्वीरों में भी झलकता है। इन तस्वीरों में महाराजा हरि सिंह के दरबार का वैभव है, पुराने श्रीनगर की गलियां हैं, झेलम की रवानी है, पर्यटन के सुनहरे दौर की झलक के साथ 1947 के बंटवारे से बदली दुनिया भी। इन सबको एक सदी से अधिक समय से अपने कैमरे में समेटे हुए है श्रीनगर का ऐतिहासिक महट्टा स्टूडियो। आज विश्व फोटोग्राफी दिवस के अवसर पर महट्टा स्टूडियो की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक फोटो स्टूडियो का इतिहास नहीं, बल्कि कैमरे में दर्ज कश्मीर के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलाव की कहानी भी है।

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अतीत के बारे में बताते 1972 से स्टूडियो में कार्यरत मोहम्मद सोफी। - फोटो : अमर उजाला
हाउसबोट से शुरू हुआ सफर
इस कहानी की शुरुआत 1905 से हुई। गुरदासपुर, पंजाब से कश्मीर पहुंचे फोटोग्राफी के शौकीन तीन भाइयों अमरनाथ मेहता, रामलाल मेहता और रामचंद्र मेहता ने श्रीनगर में झेलम नदी में एक हाउसबोट को ही अपना चलता-फिरता फोटो स्टूडियो बना लिया। काम बढ़ा तो 1918 में हाउसबोट से निकलकर झेलम के किनारे स्थायी स्टूडियो बना लिया। यहीं से कैमरे ने सिर्फ लोगों के चेहरे नहीं, बल्कि पूरे दौर को दर्ज करना शुरू किया।'

महाराजा के दरबार तक पहुंचा कैमरा
महट्टा स्टूडियो के इतिहास में 1930 बड़ा पड़ाव साबित हुआ। मेहता बंधु महाराजा हरि सिंह के शाही फोटोग्राफर बने। उन्हें शाही दरबार और महल तक पहुंच मिली। राजपरिवार के समारोह, दरबारी जीवन और तत्कालीन कश्मीर के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की दुर्लभ तस्वीरें इसी दौर में कैमरे में कैद हुईं।
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वर्ष 2026 में महट्टा स्टूडियो। - फोटो : अमर उजाला
मेहता से महट्टा...
फरवरी 1972 में रामचंद्र मेहता के बुलावे पर महज 16 वर्ष की उम्र में स्टूडियो में काम करने पहुंचे गुलाम मोहम्मद सोफी आज भी सुबह स्टूडियो का ताला खोलते हैं। मेहता से ‘महट्टा’ नाम पड़ने की कहानी बताते हुए सोफी कहते हैं कि वर्ष 1905 में हाउसबोट में चलने वाले इस स्टूडियो में बड़ी संख्या में अंग्रेज फोटो खिंचवाने आते थे। वे ‘मेहता’ शब्द का सही उच्चारण नहीं कर पाते थे और इसे ‘महट्टा’ कहते थे। फिर यही नाम लोकप्रिय हो गया।

कई शहरों तक पहचान
प्रतिष्ठा बढ़ी तो स्टूडियो का विस्तार भी हुआ। रावलपिंडी, सियालकोट, लाहौर और मरी हिल, पहलगाम, गुलमर्ग, जम्मू और दिल्ली तक शाखाएं पहुंचीं। जम्मू में ज्यूल चौक व रघुनाथ बाजार, दिल्ली में कनॉट प्लेस इसके प्रमुख ठिकाने बने। फिर 1947 का विभाजन आया। पहलगाम, गुलमर्ग के स्टूडियो तबाह हो गए। पाकिस्तान में मौजूद शाखाएं भी बंद हो गईं। इसके बाद श्रीनगर व दिल्ली स्टूडियो ने विरासत आगे बढ़ाई।

देश का दूसरा सबसे पुराना स्टूडियो
भारत सरकार ने 2012 में श्रीनगर के ‘महट्टा एंड कंपनी’ फोटो स्टूडियो को देश के दूसरे सबसे पुराने फोटोग्राफी स्टूडियो के रूप में मान्यता दी। अब इस ऐतिहासिक धरोहर को हेरिटेज के रूप में विकसित करने की तैयारी है। स्वर्गीय जगदीश मेहता की पत्नी अनीता मेहता (75) और गुलाम मोहम्मद सोफी (70) के अनुसार, स्टूडियो में दशकों पुराने कैमरे, रील, फोटो बनाने की मशीनें और अन्य दुर्लभ सामान सुरक्षित रखे हैं। अनीता मेहता के मुताबिक, उनके दोनों बेटों ने इसे हेरिटेज के रूप में विकसित करने की पहल शुरू की है। उम्मीद है कि 2026 में इसे फोटोग्राफी के शौकीनों और इतिहास प्रेमियों के लिए समर्पित किया जा सकेगा।
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