हीरानगर। सीमा से पांच किलोमीटर के दायरे में स्थित स्कूल चार दिन की छुट्टी के बाद सोमवार को खुले थे। जब तक गोलाबारी शुरू हुई स्कूल लग चुके थे। ऐसे में हजारों की तादाद में स्कूली बच्चे भी स्कूलों में ही फंसकर रह गए। प्रशासन ने समीक्षा के बाद एहतियातन स्कूलों से बच्चों को बाहर न भेजने की हिदायत दे दी। दिन भर धमाकों की आवाजें सुनते विद्यार्थी और शिक्षक डरे सहमे स्कूलों में कैद रहे।
बच्चों ने बताया कि सीमावर्ती इलाके में रहना उनके लिए रोज जिंदगी और मौत की जंग को लड़ने जैसा है। भविष्य कहां है कुछ पता ही नहीं है। गोलाबारी शुरू होते ही स्कूलों पर ताले लटक जाते हैं। पाठ्यक्रम पूरा होना तो दूर की बात, आज वो दुनिया से पीछे चल रहे हैं। बच्चों ने कहा कि सीमावर्ती इलाके अब पिछड़ चुके हैं। शिक्षा पूरी करने के बाद भी उनके भाई बहन बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। अभिभावक चाहते हैं कि पढ़ लिखकर कुछ बनें लेकिन पाकिस्तान जो चाहता है वो ही हो रहा है। सरकार ने लोगों को अपने हाल पर जीने मरने को छोड़ दिया है।