चिकन, मटन, मछली और अंडों की उपलब्धता के लिए रियासत को बहुत हद तक आयात पर निर्भर रहना पड़ रहा है। शुक्रवार को पशु, भेड़ पालन और मत्स्य मंत्री अब्दुल गनी कोहली ने विधानसभा में जो आंकड़े सदन के समक्ष रखे उनसे इस बात की पुष्टि हो रही है कि प्रदेश में पशु पालन और मत्स्य पालन के क्षेत्र में काफी काम किया जाना शेष है।
अनुदान की मांग पर चर्चा के बाद मंत्री ने सदन को बताया गया कि 2007 की जनगणना में पशुओं की आबादी 1.09 करोड़ थी जो 2012 की जनगणना में 92 लाख रह गई। दुग्ध उत्पादन में 2015-16 के दौरान 24 लाख मीट्रिक टन हुआ है जो कि 2012-13 के 20.22 लाख मीट्रिक टन से अधिक है। हालांकि अपार संभावनाओं के बावजूद शिक्षित युवा इस क्षेत्र को रोजगार के रूप में अपनाने से कतरा रहा है।
प्रदेश में पोल्ट्री मांस का उत्पादन 2007-08 के 431 लाख किग्रा से बढ़कर 2015-16 में 640 लाख किग्रा पहुंचा है। फिर भी 122 लाख किग्रा पोल्ट्री मांस का आयात करना पड़ रहा है।
प्रत्येक जिले में कम से कम एक हैचरी स्थापित करने के प्रयास जारी हैं। अंडे की मांग का 32 प्रतिशत ही राज्य में उत्पादन होता है और शेष 68 फीसदी आपूर्ति बाहरी राज्यों से करनी पड़ रही है।
मटन उत्पादन 2007-08 में 272.10 लाख किग्रा था जो 2015-16 में बढ़कर 321 किग्रा तक पहुंचा है, हालांकि 555 लाख किग्रा की मांग की अपेक्षा यह उत्पादन भी कम है और 42 प्रतिशत आपूर्ति आयात के द्वारा होती है।
मत्स्य पालन के क्षेत्र में राज्य कुछ आत्मनिर्भर दिखता है। प्रदेश में 15000 मछुआरे हैं जो मिलकर 20000 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन करने में सक्षम हैं। फिर भी 20 फीसदी मांग आयात से पूरी होती है। इन सबके बावजूद वर्ष 2015-16 में मछली और दवाओं की बिक्री से सरकार ने 12.76 करोड़ का राजस्व जुटाया है। चर्चा के बाद सदन ने पशु, भेड़ पालन और मत्स्य पालन विभाग को वर्ष 2016-17 के लिए 577.92 करोड़ रुपये की अनुदान राशि ध्वनि मत से पारित कर दी।