फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ट्यूशन का टेंशन बाल मन पर डालता है दबाव, छोटी उम्र में बच्चों को पहुंचाता है नुकसान

Wed, 17 Apr 2019 12:15 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो करिश्मा चिब, जम्मू
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : फाइल, अमर उजाला
विज्ञापन
बदलते समय के साथ बच्चों में और उनके पढ़ाई करने के तरीकों में भी काफी बदलाव आया है। इसी का एक पार्ट है ट्यूशन। ट्यूशन से न सिर्फ पढ़ाई में मदद मिलती है, बल्कि यह एक ट्रेंड-सा बन गया है। 9वीं से 12वीं कक्षा के विद्यार्थी शुरू से ही ट्यूशन पर निर्भर हो रहे हैं। हद तो यह है कि आजकल अभिभावक नर्सरी से पांचवीं तक के बच्चों को भी ट्यूशन भेज देते हैं। कभी उस बाल मन पर पढ़ते मानसिक दबाव का अंदाजा नहीं होता।
विज्ञापन


छोटी उम्र से ही बच्चों को ट्यूशन भेज देना क हीं न कहीं बच्चों पर मानसिक दबाव डालता है। अभिभावक बच्चों पर खुद ध्यान देने की जगह उन्हें किसी के पास पढ़ने के लिए भेज देते हैं, ताकि वह खुद प्री हो सकें। कुछ अभिभावकों को यह भी पता नहीं रहता कि उनके बच्चे किस तरह पढ़ रहे हैं। उन्हें बस यही पता रहता है कि बच्चा स्कूल से घर आया और उसे ट्यूशन भेजना है।

कई बच्चों को दो-दो जगह ट्यूशन पढ़ने भेजा जाता है। इससे बच्चे इतने थक चुके होते हैं कि उन्हें या तो खेलने का वक्त नहीं मिलता है, या उनमें खेलने की ऊर्जा नहीं बचती है। ऐसी स्थिति पर मनो चिकित्सक और मनोविज्ञानी भी चिंता जताते हैं।
विज्ञापन

 

पैरेंट्स को बच्चों को ट्यूशन भेजने की जगह घर में ही पढ़ाई में मदद करनी चाहिए। आजकल हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी हो गई है कि एक क्लास में इतने बच्चे होते हैं कि बच्चों को क्लास में सारी बातें स्पष्ट रूप से समझ नहीं आती। ऐसे में पैरेंट्स को चाहिए वह बच्चों को अपने व्यस्त समय में से कुछ समय निकाल कर उनके साथ व्यतीत करें और उनकी परेशानियों को समझें।- नेहा शर्मा, स्कूल अध्यापिका

 

मुझे लगता है कि छोटे बच्चों को ट्यूशन की कोई जरूरत नहीं होती। इससे उन पर मानसिक दबाव पड़ता है। मुझे लगता है कि स्कूल जाने के बाद भी अगर बच्चों को घर आकर ट्यूशन की जरूरत पड़ जाए तो उस स्कूल और वहां के टीचर्स का क्या काम? स्कूल के टीचर्स को चाहिए कि वह बच्चों को उतना ही काम दें, जितना वह खुद कर सकें। उन्हें स्कूलों में ही इस काबिल बनाएं कि ट्यूशन की जरूरत न पड़े। इसमें पैरेंट्स की भी बहुत गलती रहती है जो खेलने की उम्र में छोटे बच्चों पर ट्यूशन का बोझ डाल देते हैं। उन्हें चाहिए की कुछ समय निकाल कर बच्चों से बात करें और उन्हें खुद पढ़ाई में मदद करें।- डॉ. आरती बक्शी, मनोविज्ञानी

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें