रविवार की रात से सोमवार तक अरनिया सेक्टर में भले ही पाकिस्तानी बंदूकें शांत रही हों, लेकिन सीमावर्ती ग्रामीणों के लिए खतरा टला नहीं है। लोग अभी दहशत में हैं और शाम ढलते ही गांवों को छोड़ दे रहे हैं।
दरअसल, पाकिस्तानी गोलाबारी ने अरनियां कसबे सहित आसपास के गांवों में जमकर कहर बरपाया है। इससे दहशतजदा लोगों ने परिवार सहित शिविरों में शरण ली है। पिछले दिनों दो दिन ठहरने के बाद पाकिस्तान ने फिर से गोलाबारी शुरू कर दी थी। ऐसे में लोग किसी भी हालत में रात को गांव में ठहरना सुरक्षित नहीं समझ रहे हैं।
सोमवार शाम साढ़े सात बजे ही अरनिया सहित सीमावर्ती सभी गांवों में सन्नाटा पसर गया। अकेेले अरनिया कसबे की आबादी तकरीबन बीस हजार है। रविवार को रात को करीब चार सौ लोग ही मवेशियों की देखभाल के लिए गांव में रुके होंगे। बच्चे और महिलाएं तो गांव में कहीं नहीं दिखाई दीं। यही हाल गांव अला का है। यहां करीब डेढ़ सौ लोग ही ठहरे होंगे।
इसी तरह चंगिया पंचायत में 175, तरेबा में तीन हजार में से ढाई सौ, जव्वोयाल में 1800 में से सवा दो सौ से अधिक लोग नहीं रुक रहे हैं। जो कुछ लोग रात को गांव में रुक भी रहे हैं, वह हर वक्त दहशत में रहते हैं कि कहीं कोई गोला उनके घर में न आ गिरे।
क्षेत्र के धर्मपाल, लालचंद, रामलाल, बिशन सैनी, स्वरूप चंद, अतर सिंह आदि का कहना है कि पाकिस्तानी बंदूकों का मुंह खुला हो या बंद, उन्हें तो सीमा पर खौफ में घुट-घुटकर ही जीना है। पलायन के बारे में उनका कहना है कि जान तो हर कोई बचाना चाहता है। लेकिन गांव में रुकना मजबूरी है। अगर गांवों में रुकेंगे नहीं तो मवेशियों के नुकसान का आंकड़ा और बढ़ जाएगा। मवेशी नहीं होंगे तो घर की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं रहेगी।