भारत के दूसरे हिस्सों की तरह ही जम्मू और कश्मीर में भी चुनावी तैयारियों की सरगर्मियां देखी जा सकती हैं।
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लेकिन चुनावी तौर-तरीकों के लिहाज से कश्मीर भारत के दूसरों हिस्सों से बहुत अलग है। हालांकि जम्मू और लद्दाख के इलाकों में मोटे तौर पर देशभर के मिजाज के मुताबिक नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी पर चुनावी बहस-मुबाहिसों का दौर जारी है पर कश्मीर घाटी की अपनी चुनावी दुनिया है।
यहां दो प्रमुख सियासी धडे जिन्हें मुख्यधारा के राजनीतिक दलों और अलगाववादी संगठनों में बांटा जाता है, एक दूसरे के खिलाफ विरोध का मोर्चा खोले हैं। मुख्यधारा की सियासी जमातों में वो दल हैं, जो कश्मीर के भारत में विलय का समर्थन करते हैं और पृथकतावादी राजनीतिक पार्टियां इसकी मुखालफत करती हैं।
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जहां तक आम चुनाव की बात है, मुख्यधारा के राजनीतिक दल न केवल आपस में प्रतिस्पर्द्धा कर रहे हैं बल्कि अलगाववादियों का मुकाबला वे एकजुट होकर कर रहे हैं।
बहिष्कार
हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का कट्टरपंथी सैयद अली गिलानी की हिमायत वाला धडा, हुर्रियत के ही नरमपंथी धडे के नेता मीरवाइज उमर फारूक, जम्मू और कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के यासीन मलिक और जम्मू कश्मीर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के शब्बीर शाह, ये सभी लोकसभा चुनावों का बहिष्कार कर रहे हैं।
लेकिन मुख्यधारा की सियासी जमातें आवाम को ये समझाने में मसरूफ हैं कि उन्हें वोट डालने के लिए घर से बाहर निकलना चाहिए। मुमकिन है कि बहिष्कार की अपीलों का घाटी में बहुत ज्यादा असर न हो, पर यह भी सच है कि अलगाववादी पूरे जोर-शोर से अपना अभियान चला रहे हैं।
और मुख्यधारा की सियासी जमातों पर इसका असर यह पडा है कि वे पहले की तरह बिजली, सडक और पानी जैसे मुद्दों से अपना रुख मोडकर कश्मीर की बात उठाने लगी हैं। जम्मू और कश्मीर की प्रमुख विपक्षी पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने कुछ ही दिन पहले अपना घोषणापत्र जारी किया है।
पीडीपी के मुखिया और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने मीडिया से कहा है कि अगर उनकी पार्टी के उम्मीदवार निर्वाचित होते हैं, तो वे कश्मीर के मुद्दे पर बात करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलवाएंगी।
'नरम अलगाववाद'
कश्मीर प्रस्ताव, आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (अफ्स्पा) और मानवाधिकार के मुद्दे उठाकर पीडीपी 'नरम अलगाववाद' की ओर रुख करती दिख रही है।
पार्टी लोगों को यह समझाने में जुटी है कि अलगाववादी जो चुनाव बहिष्कार के जरिए हासिल करना चाहते हैं, वह पीडीपी लोकतांत्रिक तरीके से हासिल करेगी और इसके लिए लोगों को मतदान के दिन बाहर आकर उसके उम्मीदवारों को चुनना होगा।
सत्तारूढ नेशनल कॉन्फ्रेंस भी इस दौड में पीछे नहीं दिख रही। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बार-बार कश्मीर से जुडे राजनीतिक मसले पर भारत-पाकिस्तान की बातचीत की पैरवी की है।
मुख्यमंत्री ने हाल के दिनों में हजारों बार ये दोहराया होगा कि कश्मीर के सामने केवल अर्थव्यवस्था, नौकरी और विकास का मसला नहीं बल्कि इसे ऐसे बडे सियासी मुद्दे से रूबरू होना पड रहा है, जिस पर भारत और पाकिस्तान को गंभीर बातचीत करनी है।
चैन से नहीं बैठेंगे'
उमर अब्दुल्ला अफ्स्पा को हटाने की बात कर रहे हैं और लोगों को समझा रहे हैं कि कानून खत्म होने तक वे 'चैन से नहीं बैठेंगे।' कश्मीर घाटी की तीनों लोकसभा सीटों पर नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के बीच सीधा मुकाबला है और एनसी को कांग्रेस का समर्थन हासिल है।
हालांकि बारामूला निर्वाचन क्षेत्र एक अपवाद है, जहां सज्जाद लोन की पीपुल्स कॉन्फ्रेंस तेजी से अपनी पैठ बना रही है और लोगों को चौंकाने का माद्दा रखती है।
ऐसे हालात में जबकि सभी पार्टियां अलगाववादियों के अभियान को लेकर फिक्रमंद हैं, वे उन्हीं (अलगाववादियों) की जुबान में चुनावों में ज्यादा से ज्यादा भागीदारी के लिए लोगों को समझाने की कोशिश में हैं।
चुनाव प्रचार का एक और दिलचस्प पहलू यह भी है कि एक ओर जहां पीडीपी ने 'नरम अलगाववाद' का रवैया अख्तियार कर रखा है, वहीं दूसरी तरफ उसने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) पर डोरे डालने भी शुरू कर दिए हैं।
पीडीपी का घोषणापत्र जारी करते वक्त मुफ्ती मोहम्मद सईद ने अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार की तारीफ की और कहा कि उनकी सरकार एकमात्र सरकार थी, जिसने कश्मीर मुद्दे को तवज्जो दी और मसले के हल की प्रक्रिया शुरू की।
मुफ्ती मोहम्मद सईद ने इस पर अफसोस जताया कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की कोई कश्मीर नीति नहीं थी। इससे इसके भी संकेत मिलते हैं कि ऐसी सूरत में जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस यूपीए का औपचारिक तौर पर एक हिस्सा है, पीडीपी को एनडीए में शामिल होने पर शायद कोई ऐतराज न हो।
पीडीपी की नजर राज्य विधानसभा चुनावों पर भी है जो इस साल के आखिर में होने हैं।
अगर एनडीए दिल्ली में हुकूमत में आती है तो जम्मू पर उसका कुछ असर होगा, जहां भाजपा बेहतर प्रदर्शन कर सकती है और अगर घाटी में पीडीपी को ठीक सीटें मिलीं, तो जम्मू और कश्मीर में पीडीपी और बीजेपी के गठबंधन वाली सरकार के गठन की सूरत बन सकती है।