उधमपुर। भाद्रपद पूर्णिमा के बाद से शुरू हुए पितृपक्ष का रविवार को आठवें श्राद्ध था। इसे अष्टमी श्राद्ध कहा जाता है। इस दिन उन पितरों का श्राद्ध किया जाता है जिनका निधन अष्टमी तिथि को हुआ हो। रविवार सुबह से ही देविका और अन्य तीर्थ स्थानों और मंदिराें में भारी भीड़ देखने को मिलती।
कई लोगों ने घरों में श्राद्ध की विधियां पूरी कीं। हिंदू धर्म में मान्यता है कि श्राद्ध पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए किया जाता है। श्राद्ध व्यक्ति के मृत्यु तिथि के आधार पर किया जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध न करने पर पितर रुष्ट हो जाते हैं और परिवार में बाधाएं आती हैं। पंडित पवन सेठ बताते हैं कि पितृ पक्ष में किया गाया श्राद्ध पितरों को तृप्त करता है। यह सिर्फ एक परंपरा नहीं बल्कि आत्मिक ऋण चुकाने का माध्यम है।
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श्राद्ध करने की प्रक्रिया वैदिक विधियों पर आधारित होती है। प्रात: स्नान के बाद साफ वस्त्र पहनकर पूर्व दिशा की ओर बैठकर तिल, चावल और जल कर तर्पण किया जाता है। फिर पितरों को पिंड अर्पित किया जाता है। उसके बाद ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है। कई लोग पवित्र नदी के किनारे तर्पण करते हैं और पिंड अर्पित करते हैं।
परंपरागत रूप से श्राद्ध पुरुषों द्वारा ही किया जाता है लेकिन अब महिलाएं भी इस कर्म में सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं। यदि कोई पुरुष सदस्य घर पर न हो तो महिलाएं भी श्राद्ध कर सकती हैं। अष्टमी श्राद्ध सिर्फ एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं बल्कि परिवार की परंपरा और पितरों के प्रति आभार व्यक्त करने का एक माध्यम है।