बेघर हुए परिवारों का बड़ा सवाल, कब और कैसे होगी घर वापसी
सांप बिच्छू के डर से जागते कटती है रात, शौचालय की भी दिक्कत
उधमपुर। तेज बारिश, बाढ़ और भूस्खलन की हालिया घटनाओं ने जिला उधमपुर के हजारों परिवारों को बेघर कर टेंटों में खाना-बदोशों की तरह जीवन जीने पर मजबूर कर दिया है। बीते एक माह से यह लोग अपने उजड़े आशियानों का ठिकाना ढूंढ़ रहे हैं। सरकार से पुनर्वास और राहत की आस और उम्मीद तो है लेकिन दस बाय दस के तंबुओं में परिवार साथ लेकर जीवन का गुजारा करने की कठिन दुश्वारियां हर बीतते दिन के साथ इनकी हिम्मत और सहन-शक्ति की परीक्षा ले रहीं हैं। पेश है राहत शिविरों की पड़ताल करती संवाद की रिपोर्ट।
राहत शिविरों में रह रहे सभी परिवारों का एक ही सबसे बड़ा सवाल है आखिर कब तक उन्हें इन तंबुओं में रहना पड़ेगा? कब उनके उजड़े आशियाने फिर से बसेंगे? क्या सरकार उन्हें जमीन के बदले जमीन और घर के बदले घर देगी या फिर उन्हें अपने बर्बाद हुए घरौंदों के मलबों की खाक में ही अपना भविष्य तलाशना होगा?
प्रशासन की प्रारंभिक रिपोर्ट के मुताबिक, 26 अगस्त से 3 सितंबर तक की बाढ़ भूस्खलन की घटनाओं में जिले में 2,500 से अधिक घर पूरी तरह से ध्वस्त हो गए हैं। 6,000 से अधिक घर आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हैं। इन प्रभावित परिवारों को तत्काल टेंटों और राहत शिविरों में स्थानांतरित कर खाने पीने का प्रबंध किया गया है।
दूसरी ओर राहत शिविरों में सुविधाओं की कमी है, और जंगली जानवरों और विषैले जीवों के डर से रात को ठीक से नींद भी नहीं आती है। बच्चों की कापी किताबें यानी उनके सपने मलबों में दब गए हैं। उनका स्कूल जाना छूट गया है। राहत शिविरों में उन्हें पढ़ने की जगह नहीं है।
तिरछी वार्ड 6 की रहने वाली कक्षा छह की छात्रा नंदनी देवी ने बताया कि उनकी किताबें, वर्दी और स्कूल बैग ध्वस्त हुए घर के मलबे में दबकर रह गए हैं। वह कहती हैं, हम परिवार के साथ बीते लगभग 25 दिनों से इस छोटे से टेंट में रह रहे हैं। पढ़ने का प्रयास करते हैं लेकिन तंग जगह में पढ़ने में मन ही नहीं लगता, सांप बिच्छू का डर सताता रहता है।
तिरछी के रहने वाले मदन लाल ने बताया कि उनका घर और जमीन भूस्खलन की भेंट चढ़ चुके हैं आज न रहने का ठिकाना है और न भविष्य का । मेरे बूढ़े पिता रोज अपने उजड़ चुके आशियाने के मलबे में अतीत के सपने तलाशने जाते हैं और आंखों में आंसू और मन में निराशा भरकर लौट आते हैं।
राहत शिविर में रहने वाली बबली देवी कहती हैं टेंटों में राशन तो मिल रहा है लेकिन हमारे बर्तन और गैस सिलिंडर तक घर के मलबे में दब चुके हैं, नया खरीदने की क्षमता नहीं है। यहां शौचालयों तक की सुविधा नहीं है। खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है।
राकेश कुमार का कहना है पाई पाई जोड़कर बनाया गया पक्का घर गिर गया है। पुराने कच्चे घर तो पूरी तरह से मलबे में तब्दील हो गए हैं। हम 20 कनाल उपजाऊ जमीन के मालिक थे अब जमीन भी नहीं बची। दस बाय दस के दो टेंटों में बूढ़े मां-बाप और परिवार के 15 सदस्यों के साथ गुजारा करना पड़ रहा है। इस रात का कोई सवेरा नहीं दिखता।
इन परिवारों की कहानियां इस बात की गवाही देती हैं कि कैसे प्राकृतिक आपदाएं लोगों की जिंदगी को पूरी तरह से बदल सकती हैं और उन्हें अनिश्चितताओं के बीच जीने पर मजबूर कर सकती हैं। अब देखना यह है कि सरकार और प्रशासन इन परिवारों की मदद के लिए क्या कदम उठाते हैं और उन्हें उनके पैरों पर खड़ा करने के लिए क्या समर्थन प्रदान करते हैं।
प्रशासन की तरफ से प्रभावितों की राहत के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहें हैं। टेंटों के अलावा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं वाले प्रभावितों के लिए पंचायत घरों, सामुदायिक भवनों, छात्रावास इत्यादि में भी बंदोबस्त किए गए हैं। मुआवजा वितरण की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। 2500 की धनराशि कपड़ों इत्यादि के लिए भी इनके खातों में डाली गई है। रसद, तिरपाल, टेंट इत्यादि भी दिए गए हैं। एसडीआरएफ नियमों के तहत जल्द से जल्द पहले इनका अस्थायी पुनर्वास हो और फिर बाद में स्थायी का भी बंदोबस्त हो सके। अतिरिक्त मुआवजा राशि के लिए भी हमने सरकार से विशेष राहत पैकेज की मांग की है।
- एडीसी प्रेम सिंह