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Udhampur News: सरकारी मिडिल स्कूल दंदयाल की इमारत जर्जर, मूलभूत सुविधाओं की कमी

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कमरों की कमी से मिडिल स्कूल दंदयाल के आंगन में बैठकर पढाई करते छात्र। 
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संवाद न्यूज एजेंसी
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उधमपुर। सरकारी स्कूलों में सुविधाजनक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के दावे तो बहुत हैं लेकिन जमीनी स्तर पर मौजूद खस्ताहाल इमारतों वाले स्कूलों को देखकर ये दावे हवा में नजर आते हैं। उधमपुर में भी कई ऐसे स्कूल हैं जहां मूलभूत सुविधाओं की कमी है। कुछ की इमारतें जर्जर हैं। बच्चों को शिक्षा का ज्ञान अपनी जान संकट में डालकर लेना पड़ रहा है।

ऐसा ही एक स्कूल शहर के वार्ड नंबर 21 के दंदयाल में है। बरसाती नाले के किनारे पर मौजूद सरकारी मिडिल स्कूल दंदयाल दो कमरों में चल रहा है। पहाड़ी से सटे इस स्कूल की इमारत पर लगातार मलबा गिरता रहता है। स्कूल का पिछला हिस्सा आधे से ज्यादा मलबे तले दब चुका है और इसके बोझ से इमारत गिरने का खतरा पैदा हो गया है। कमरों के भीतर दीवारों पर भी सीलन और दरारें आ चुकी हैं। खिड़कियां क्षतिग्रस्त हो रही हैं। छत पर काई और पानी का जमाव हो गया है।
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दूसरी तरफ सुरक्षा दीवार के अभाव में बरसाती नाले में गिरने का डर, आसपास जंगली झाड़ियों की भरमार और जहरीले सांप- बिच्छुओं का डर इत्यादि ऐसे कारक हैं जो इस स्कूल में विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतरते। बच्चों की सुरक्षा राम भरोसे है।

2010 में हुआ अपग्रेड, नहीं हो पाई आठ कक्षाओं के संचालन की व्यवस्था

करीब चार दशक पुराना यह स्कूल पहले किराये की इमारत में चलता था। साल 2005 में इसकी अपनी इमारत तैयार की गई। इसके बाद साल 2010 में दर्जा बढ़ाकर इसे मिडिल स्कूल बना दिया गया लेकिन यहां आठ कक्षाओं के विद्यार्थियों को शिक्षा देने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर का बंदोबस्त अभी तक नहीं हो पाया। को-एजुकेशन वाले इस स्कूल में वर्तमान में 71 छात्र-छात्राएं हैं । इन्हें पढ़ाने के लिए सात शिक्षक तैनात हैं। स्कूल में न तो खेल मैदान है और न सुरक्षा को लेकर चहारदीवारी। स्कूल में एकमात्र कक्षा रूम में बच्चों के बैठने के लिए चंद टूटे-फूटे डेस्क हैं। फट्टे और बोरियां डालकर बच्चे इस पर बैठते हैं। इन्ही दो कमरों में स्कूल का सामान भरा पड़ा है।
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स्कूल में खेल मैदान नहीं होने से काफी परेशानी आती है। स्कूल के छोटे से आंगन में क्रिकेट, वॉलीबॉल, कबड्डी आदि खेल खेलना संभव नहीं हैं। स्कूल की चहारदीवारी भी नहीं है। स्कूल के साथ मौजूद नाले में भी गिरने का डर बना रहता है।
पूजा देवी (7वीं कक्षा)

बरसात में सड़क की तरफ से सारी नालियों की गंदगी जमा होकर स्कूल के आंगन में आकर जमा हो जाती है। पूरा स्कूल परिसर गंदगी और बदबू से भर जाता है। मुश्किल से सफाई होती है। कुछ दिन बाद हालात फिर पहले जैसे हो जाते हैं।
अनामिका राजपूत,( 8वीं
क्षा)
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स्कूल में कमरों की काफी ज्यादा कमी है। इस कारण बाहर आंगन में कक्षाएं लगती हैं। बारिश होने पर पांचवीं कक्षा तक के बच्चों को छुट्टी दे दी जाती है। स्कूल की दीवार पर बढ़ रहे पहाड़ी के दबाव से कक्षाओं के भीतर बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थी भी डर के साये में रहते हैं।
- आरव ( 7वीं कक्षा)


अन्य स्कूल बहुत अच्छे हैं लेकिन हमारे स्कूल की हालत काफी खराब है। शिक्षक अच्छे से पढ़ाते हैं लेकिन कंप्यूटर शिक्षा, खेल मैदान, क्लास रूम की कमी और बैठने के लिए अच्छे बेंचों की कमी है। आंगन में टाट पर बैठने से हर रोज हमारी यूनिफोर्म और बस्ते तक गंदे हो जाते हैं।
-गणेश कुमार (7वीं कक्षा)
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कोट..
यह स्कूल मुख्य शिक्षा अधिकारी कार्यालय से करीब 200 मीटर की दूरी पर है। इसके बावजूद स्कूल की हालत अत्यधिक खराब है। जरूरी सुविधाओं का अभाव है। बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी खतरा बना हुआ है। अपने कार्यकाल में स्कूल के लिए दूसरी जगह अलाट कराई थी लेकिन शिक्षा विभाग की सुस्त रवैये से वहां पर नया स्कूल नहीं बन पाया। यह एक गंभीर मसला है। इसका जल्द समाधान होना चाहिए।
दर्शन कुमार, पूर्व पार्षद
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स्कूल के लिए दूसरी जगह तलाश की गई है इसलिए इसमें सुविधाएं मुहैया नहीं करवाई जा रहीं। वहां सामान रखने की जगह नहीं हैं। कक्षा रूम में ही स्कूल के कुर्सियां, मेज व अन्य जरूरी सामान रखना पड़ता है। नई इमारत के लिए जमीन का चयन हो चुका है। आगे के निर्माण कार्य के लिए प्रस्ताव भेजा गया है। मामला निदेशक कार्यालय में अटका हुआ है।
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- सावित्री देवी, प्राध्यापिका


इस स्कूल में जगह की कमी के चलते इसे विकसित नहीं किया जा सका। लगभग 300 मीटर की दूरी पर खंबलिया क्षेत्र में करीब दो कनाल जमीन का चयन किया गया है। जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद वहां इमारत बनाने के लिए निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा।
-कल्पना जसरोटिया, डिप्टी सीईओ
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