संवाद न्यूज एजेंसी
उधमपुर। जिला मुख्यालय से लगभग 65 किलोमीटर दूर ब्लाॅक घोरड़ी की मनोरम पहाड़ियों में मराहड़ा माता के नाम से प्रसिद्ध मां भगवती चामुंडा रूप में विराजमान हैं। यह तीर्थ स्थान पूरे जम्मू संभाग के लोगों की आस्था का एक बडा केंद्र हैं। यहां नवरात्रों में हर दिन लगभग तीन हजार श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
आम दिनों में भी इनकी संख्या काफी ज्यादा रहती है। साल दर साल यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। भक्तों का कहना है कि यहां आने वालों की सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। मंदिर तक पहुंचने के लिए बरमीन और घोरड़ी से सीधी सड़क की सुविधा उपलब्ध है। चूंकि बरमीन जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद है इसलिए उधमपुर की तरफ से जाने वाले श्रद्धालु मंदिर तक आवाजाही के लिए ज्यादातर इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। जबकि रामनगर की तरफ से आने वाले ज्यादातर यात्री ब्लाॅक मुख्यालय घोरड़ी से होकर मराहड़ा माता मंदिर तक आवाजाही करते हैं।
मंदिर तक सड़क बनने के बाद श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी
पहले मंदिर तक सड़क की पहुंच नहीं होने के कारण श्रद्धालुओं को करीब 30 किलोमीटर तक की पैदल चढ़ाई चढ़कर जाना पड़ता था। इससे उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ता था। रास्ते में मूलभूत सुविधाओं की भी काफी ज्यादा कमी थी। लेकिन अब कुछ साल पहले मंदिर क्षेत्र तक सड़क का निर्माण होने के बाद इस क्षेत्र का तेजी से विकास होने लगा है और यात्रियों की आमद भी बढ़कर हजारों में पहुंच गई है। खासकर नवरात्रों के दिनों में यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 50 हजार के आंकड़े को भी पार कर जाती है। काफी संख्या में छड़ियां लेकर भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। रात्रि जागरण होते हैं और नौ दिनों तक भंडारा चलता है। श्रद्धालुओं के ठहरने का भी यहां प्रबंध उपलब्ध कराया जाता है।
प्रकृति की गोद में बसा है माता का दरबार
मराहड़ा माता का दरबार प्रकृति की गोद में बसा है। शहर सहित पटनीटॉप और रामनगर का नजारा साफ नजर आता है। यह ब्लाॅक घोरड़ी की सबसे ऊंची चोटी मानी जाती है। सर्दी के सीजन में यहां खूब बर्फबारी भी होती है और पूरी चोटी बर्फ की सफेद चादर से लकदक हो जाती है। दरबार आने वाले श्रद्धालु माता रानी के दर्शन करने के साथ ही आसपास के प्राकृतिक नजारों से भी रोमांचित होते हैं।
काफी पुराना है इतिहास, प्रचलित कथा
इसका इतिहास काफी पुराना है। प्रचलित कथा है कि प्राचीन काल में तहसील बसोहली के बागन गांव में शिव दयाल पटवारी नाम के व्यक्ति को कन्या रूप में माता रानी ने दर्शन दिए थे और कई दिनों तक उसके घर में साक्षात कन्या रूप में निवास भी करती रहीं। लेकिन बाद में जब परिजन ने कन्या रूपी माता के विवाह की बात चलाई तो माता उन्हें चामुंडा रूप में पूजने को कहकर अंतरध्यान हो गईं और फिर एक पत्थर की मूर्ति में उनके घर में वास करने लगीं। चार पीढि़यों के बाद इस परिवार के एक सदस्य ने उधमपुर के ब्लाॅक घोरड़ी के मराहड़ा गांव में बसने का मन बनाया। जब वह गांव के लिए जाने लगा तो माता रानी ने भी उसके साथ चलने की इच्छा जताई। जिस पर उसने मूर्ति स्वरूप माता रानी को पालकी में बिठाकर मराहड़ा गांव तक पहुंचाया था। रास्ते में जहां-जहां उसने विश्राम किए वहां-वहां माता रानी के देवस्थान स्थापित हुए। जबकि मराहड़ा गांव में पालकी में लाई मूर्ति को स्थापित किया और यहां माता रानी का दरबार सजाया गया।