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नाग संस्कृति : मकर संक्रांति पर तीन माह के लिए ढके भगवान वासुकी नाग के विग्रह

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भद्रवाह। जम्मू-कश्मीर के चिनाब क्षेत्र में प्रचलित प्राचीन नाग संस्कृति से जुड़ी सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए मकर संक्रांति की पूर्व संध्या भद्रवाह में भगवान वासुकी नाग के विग्रहों को तीन माह के लिए ढक दिया गया।
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यह विशेष अनुष्ठान डोडा जिले के भद्रवाह क्षेत्र में स्थित प्राचीन नाग मंदिरों से जुड़ा है। यह प्रथा स्थानीय नाग संस्कृति का हिस्सा है। इस क्षेत्र को नागों की भूमि के नाम से भी जाना जाता है।
भगवान वासुकी नाग का मुख्य मंदिर गाठा तथा वासक डेरा मंदिर भद्रवाह में स्थित है जिन्हें एक साथ भगवान वासुकी नाग का निवास और दरबार माना जाता है। इन मंदिरों में भगवान वासुकी नाग और राजा जमुतवाहन की एकल काले पत्थर की स्वयं-स्थापित प्रतिमा विराजमान है। ये दोनों मंदिर वार्षिक कैलाश यात्रा के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहां विधिवत पूजा-अर्चना के बाद ही यात्रा का शुभारंभ होता है।
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पुजारी ने बताया कि मान्यता है कि इस अवधि में भगवान वासुकी नाग पाताल लोक में प्रवेश करते हैं और इन तीन महीनों के दौरान श्रद्धालु केवल देवता के चरणों के ही दर्शन कर सकते हैं। विग्रहों को सिर से लेकर टखनों तक पारंपरिक वस्त्र ‘बग्गा’ से ढकते समय वातावरण भावुक हो गया। भक्ति गीतों के साथ नम आंखों से श्रद्धालुओं ने भगवान वासुकी नाग से आशीर्वाद लिया।
वासक डेरा की नाग भक्त पिंकी शर्मा ने कहा, मैं दिन में दो बार भगवान वासुकी नाग का आशीर्वाद लेने आती हूं। तीन महीने तक भगवान के पूर्ण दर्शन न होना हम सभी के लिए कठिन समय होता है, लेकिन संतोष इस बात का है कि भगवान के चरण खुले रहते हैं और हम बैसाखी तक वहीं से आशीर्वाद लेते रहेंगे। यह अनूठी परंपरा आज भी भद्रवाह की नाग संस्कृति, आस्था और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।
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