हजारों साल पुरानी संस्कृति को समेटे उधमपुर के बैली गांव में आज भी आदि मानव द्वारा उपयोग किए औजार और अन्य वस्तुएं मिलती हैं। उधमपुर की बावली परंपरा भी मिटती जा रही है।
ऐतिहासिक संपदा को समेटे इन धरोहरों का सरकारी या गैर सरकारी स्तर भी संरक्षण नहीं हो रहा है। पुरातत्व विभाग और प्रशासन को कई बार आगाह कराने के बाद भी इनका अस्तित्व लगभग मिट गया है।
उधमपुर विकास परिषद के अध्यक्ष अनिल पाबा के अनुसार करीब 15 साल पहले क्रिमची के मशहूर पांडव मंदिर के पास बैली गांव में आदि मानव काल के औजार व अन्य सामान प्राप्त किए थे।
इस क्षेत्र में गुफाएं भी हैं। इससे लगता है कि आदि मानव का वास इस क्षेत्र में था। इस क्षेत्र से हेयर पिन, सीप से बनी ज्वेलरी, चूड़ियों के टुकडे़, चरट औजार, मिट्टी के बने बर्तन व कई प्रकार पत्थर मिले।
हेयर पिन नेशनल म्यूजिक नई दिल्ली में रखी पिन से मिलती जुलती है जो हड़प्पा संस्कृति के समय की बताई जाती है। ग्रेफ्टी मार्क सिंधु घाटी सभ्यता से मिलता है।
इस जगह से मिले अवशेष के बाद कई बार संबंधित विभागों को लिखा गया। किसी ने दौरा करना भी मुनासिब नहीं समझा। पांडव काल के समय में बने मंदिर क्रिमची से यह जगह दो किमी के फासले पर ही है। नौवीं सदी मेें बने इस मंदिर के बैली गांव में अवशेष ही बचे हैं।
अमर संतोष म्यूजियम में सहेजे कुछ अवशेष
यही नहीं, उधमपुर में प्राचीन बावलियां के नजदीक भी राजा महाराजों की पत्थरों पर कलाकृतियां भी लुप्त होती जा रही है। कई बावलियां टूट चुकी हैं या दब गई हैं।
अपने स्वर्णिम इतिहास, धरोहरों को समेटे उधमपुर सरकारी उपेक्षा का शिकार है। धीरे-धीरे धरोहरें मिटती जा रही हैं और उनके रखरखाव के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए हैं।
बैली गांव से मिले पाषाण व नव पाषाण काल के इन अवशेषों को अमर संतोष म्यूजियम में अनिल पाबा ने संभाल कर रखा है।