फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Udhampur News: जीएमसी में नेफ्रोलॉजिस्ट डाॅक्टर नहीं, तकनीशियन कर रहे मरीजों का डायलिसिस

विज्ञापन
विज्ञापन
उधमपुर। स्वास्थ्य विभाग की ओर से किडनी मरीज को डायलिसिस की सुविधा देने के लिए 2018 में जीएमसी में बने ट्रामा सेंटर में डायलिसिस यूनिट बनाई गई थी, लेकिन आज तक डायलिसिस यूनिट में स्टाफ के साथ-साथ नेफ्रोलॉजिस्ट डाॅक्टर नहीं आ पाया है। इसके चलते तकनीशियन और नर्सिंग स्टाफ की ओर से किडनी मरीजों के डायलिसिस किए जा रहे हैं।
विज्ञापन

इसके लिए अस्पताल प्रशासन की ओर से यूनिट तैयार कर छह बेड और छह डायलिसिस मशीनें लगाई गईं। इसमें एक बेड व डायलिसिस मशीन को स्पेयर रखा जाता है। इसमें एचवीएसजी पॉजिटिव मरीज व अन्य बीमारियाें से ग्रस्त मरीजों का डायलिसिस किया जा रहा है। इसके चलते पांच मरीज ही एक शिफ्ट में डायलिसिस करवा सकते हैं।

कई तरह के होते हैं डायलिसिस मरीज

अगर किडनी मरीजाें की बात करें तो इनमें अलग-अलग तरह के डायलिसिस होते हैं। अस्पताल आने वाले मरीजों के सप्ताह में दो बार डायलिसिस किए जा रहे हैं। हालांकि डायलिसिस यूनिट को चलाने के लिए आठ कर्मचारियों की जरूरत होती है, जबकि मौजूदा समय में चार से ही काम चलाया जा रहा है।
विज्ञापन





जीएमसी में रोजाना 18 से 20 मरीज करा रहे हैं डायलिसिस
गौरतलब है कि अस्पताल परिसर में बने डायलिसिस यूनिट में रोजाना 18 से 20 मरीज डायलिसिस करवाने के लिए आते हैं। हालांकि यूनिट में छह बेड व छह मशीनें लगी हुई हैं लेकिन एक बेड व मशीन को अलग तरह के मरीजों के लिए रखा गया है। इसके चलते पांच डायलिसिस एक समय पर होते हैं। अस्पताल में डायलिसिस करवाने के लिए आने वाले मरीजों का डायलिसिस शिफ्ट वाय शिफ्ट किया जाता है क्योंकि एक शिफ्ट में पांच मरीजों के डायलिसिस होते हैं। इसके चलते बाकी मरीजों को अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। हैरानी की बात तो यह है कि जीएमसी बनने के बावजूद डायलिसिस यूनिट मेें डाक्टर का पद खाली पड़ा हुआ है। इतना ही नहीं, जीएमसी अस्पताल होेने के चलते इस पर पूरे जिले का भार है। वहां पर डायलिसिस यूनिट में बेड व मशीनों की संख्या अधिक होनी चाहिए थी। सिर्फ छह मेें से पांच मशीनों से ही काम चलाया जा रहा है। वहीं रविवार को डायलिसिस यूनिट बंद रहती है।

बिना डाॅक्टर के हो रहा है डायलिसिस
हैरानी की बात तो यह है कि अस्पताल में आने वाले किडनी मरीजों के डायलिसिस डाॅक्टर की बजाय तकनीशियन व नर्सिंग स्टाफ की ओर से किया जा रहा है। जब मरीज का डायलिसिस हो रहा होता है, उस समय अगर किसी मरीज को डाक्टर की जरूरत पड़ जाए तो अस्पताल में डाॅक्टर ही नहीं है। वहीं तकनीशियन जम्मू जाकर एक महीने का प्रशिक्षण लेेने के बाद अब मरीजों के डायलिसिस कर रहे हैं। जिले का मुख्य अस्पताल होने व जीएमसी बनने के बावजूद विभाग की ओर से डायलिसिस यूनिट तो बना दी गई है लेकिन छह साल बीत जाने के बाद भी डाॅक्टर का पद खाली पड़ा हुआ है। इतना ही नहीं, जिले के अन्य उपजिला अस्पतालों में भी डायलिसिस यूनिट न होने के चलते जिला भर से किडनी मरीज को यहां पर आकर डायलिसिस करवाना पड़ता है। उसके बावजूद यूनिट में डाॅक्टर की सुविधा नहीं है।

इस संदर्भ में जीएमसी के प्रिंसिपल डॉ. मृत्युंजय गुप्ता का कहना था कि उनके पास तकरीबन 18 से 20 मरीज अपना डायलिसिस करवा रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनके पास डायलिसिस करने के लिए नेफ्रोलॉजिस्ट डाक्टर नहीं है। अलबत्ता तकनीशियन व अस्पताल का नर्सिंग स्टाफ मरीजों का डायलिसिस कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि डायलिसिस यूनिट में खाली पड़े डाक्टर के पद के लिए उन्होंने अपने उच्च अधिकारियों को लिखित में भेज दिया है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें