उधमपुर। मनुष्य जीवन में विवेक और वैराग्य का होना अति आवश्यक है। यदि विवेक और वैराग्य नहीं है तो मानो कुछ भी नहीं है। विवेक, वैराग्य प्रभु प्रीति व मोह का उपाय सत्संग और हरि कथा है। यह संदेश संत सुभाष शास्त्री ने रठियान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह के चौथे दिन संगत को दिया।
उन्होंने संगत को बताया कि सत्संग के बिना हरि कथा सुनने को नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोह के बिना श्री राम चंद्र के चरणों में दृढ़ प्रेम नहीं होता। महापुरुषों का कथन है कि बिना सत्संग और विवेक के मोक्ष प्राप्ति का सबसे सहज साधन सत्संग है। तपस्या और त्याग आदि से भगवान उतने प्रसन्न नहीं होते, जितने सत्संग से होते हैं। प्रगाढ़ प्रेम से सत्संग द्वारा ईश्वर को प्राप्त करना सबसे सरल उपाय है।
मनुष्य सदैव सत्संग की अमृतधारा में डुबकी लगाता रहे तो जीवन को सफल बना सकता है। सत्संग को निरंतर सुधार की प्रक्रिया माना जा सकता है, जो प्रेम और सद्भावना से जीवन की वृतियों का परिमार्जन करता है। जीवन में एक बार यदि स्व-सुधार का मार्ग मिल जाए तो आत्मद्वार का लक्ष्य पूर्ण हो सकता है। जीवन में सुख शांति समृद्धि सत्संग से संभव है। जीवन के तमाम अनुतरित प्रश्नों के उतर हमें सत्संग के माध्यम से मिल जाते हैं। यह मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। सत्संग जो हमारे विचारों को शुद्ध करने में सक्षम रहता है। परिणामस्वरूप हमें आत्मिक शांति प्राप्त होती है। इसलिए मनुष्य को सदा सत्संग करते रहना चाहिए।