उधमपुर। संत मनुष्य का संग ही सभी के लिए कल्याण व हितकारी है। इसलिए सभी लोग उचित और संत व्यक्ति का ही अनुसरण करें। यह संदेश कथा वाचक सुभाष शास्त्री ने संगत को दिया।
रठियान में श्रीमद्भगवत कथा के दूसरे दिन कथावाचक ने श्रद्धालुओं को समझाया कि संगति का मनुष्य के जीवन पर गहरा असर पड़ता है। जैसी मनुष्य की संगति होगी वैसा ही उसका आचरण होगा। इसी प्रकार जैसा बीज होगा, वैसा ही उसका फल होगा। संगति अच्छी हो अथवा बुरी उसका प्रभाव मनुष्य पर अवश्य पड़ता है। संत का संग सत्संगति है और असंत का संग कुसंगति। संत माने सज्जन पुरुष और असंत माने दुष्ट दुर्जन। संत का संग कल्याणकारी, शय हारी एंव फलदायी होता है। असंत का साथ अहितकारी, भयकारी व दुखदायक होता है।
सत्संगति मनुष्य में शुभगुणों का निरंतर विकास करती है। जब हम अच्छे लोगों व विचारों के संपर्क में रहते हैं, तो हमारे व्यक्तित्व में सदगुणों का समावेश अपने आप होने लगता है। संत के संग से असंत भी संत होने लगता है। जबकि कुसंगित वह खारा पानी है जो लोहे जैसी सशक्त धातु को भी गला देती है। सच्चे मित्र अपने साथी को कभी सच्ची राह से भटकने नहीं देते। अंत में सुभाष शास्त्री ने अनुरोध किया कि सत्य का संग तभी होगा, जब आप अहिंसक हो जाओगे, ईमानदार हो जाओगे, रिश्वत लेने देने से दूर रहोगे। भ्रष्टाचार मुक्त समाज की स्थापना कर सच्चे मन से सत्संगी बन पाएंगे।