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Udhampur News: भद्रवाह में लोगों ने पारंपरिक तरीके से मनाया झिंझोली का त्योहार

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भद्रवाह में झिंझोली पर्व की रस्म पूरी करते श्रद्धालु। - फोटो : भद्रवाह में झिंझोली पर्व की रस्म पूरी करते श्रद्धालु।
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संवाद न्यूज एजेंसी
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भद्रवाह। भद्रवाह क्षेत्र में प्रचलित प्राचीन नाग संस्कृति में पूर्वजों को याद करने की सदियों पुरानी रस्म, जिसे झिंझोली या धुंधु-कुंडू पर्व बुधवार और वीरवार की मध्यरात्रि को मनाया गया।

भद्रवाह में झिंझोली अथवा धुंधु-कुंडू, दिवंगत आत्माओं को याद करने की प्राचीन नाग संस्कृति की सदियों पुरानी रस्म है, जिसे एक अनोखे रहस्यमय तरीके से जम्मू-कश्मीर के भद्रवाह में सैकड़ों नाग अनुयायी मनाते हैं।
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गांव हांगा के 90 वर्षीय प्रसिद्ध नाग अनुयायी मास्टर टेक चंद ने सदियों पुरानी नाग रस्म को उजागर करते हुए बताया कि माघ महीने में सर्दियों के दौरान पड़ने वाला यह त्योहार सदियों से मनाया जा रहा है, लेकिन अब तक बाहरी दुनिया से छिपा हुआ है।
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उन्होंने बताया कि यह रात्रिकालीन अनुष्ठान है और सुबह से ही परिवार के सभी सदस्य स्थानीय कैल की लकड़ी से बनी विशेष रूप से डिजाइन की गई लकड़ी की मशालें तैयार करते हैं। उनका मानना है कि उनके पूर्वजों की आत्माएं खुद को गर्म करने और हमें आशीर्वाद देने के लिए आती हैं, इसलिए हम लकड़ी की मशालों को हवा में घुमाते हुए उन्हें जोर से पुकारते हैं। दीपावली पर हम भगवान राम के वनवास से घर लौटने का जश्न मनाने के लिए अपने घरों को दीप (मिट्टी के दीये) से रोशन करते हैं और यहां हम अपने परिवार की दिवंगत आत्माओं की आत्माओं को बुलाने के लिए लकड़ी की मशालें जलाते हैं। वहीं गांव हांगा की अन्य महिला दुर्गा देवी ने कहा कि स्थानीय मान्यता के अनुसार हमारे पूर्वज इस दिन हमें आशीर्वाद देने के लिए स्वर्ग से नीचे आते हैं, इसलिए यह त्योहार हमारे दिल और भावनाओं के इतने करीब है। आत्माओं को बुलाते हुए झिंझोली नामक लकड़ी की मशालों को जलाने और घुमाने की रात भर की रस्म के बाद तड़के एक विशाल अग्नि स्थान पर सभी मशालों को फेंक दिया जाता है, जो इस बात का प्रतीक है कि आग में बुराई भी जल गई है और इस अनुष्ठान को दुंधु-कुंडू कहा

जाता है।
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