यह महज संयोग नहीं है कि नवाज शरीफ के पाकिस्तान प्रधानमंत्री बनने के बाद से विदेशी आतंकी संगठनों के हमले बढ़ गए हैं।
जम्मू-कश्मीर के युवकों को बहकाकर बनाए आतंकी संगठनों की सक्रियता तुलनात्मक रूप से कम रही है जबकि पाक पोषित लश्कर-ए-ताइबा जैसे संगठन ने फिर से सिर उठा रहे हैं।
नवाज के पीएम बनने के बाद से एक सौ तेरह दिन में एलओसी पर सौ बार सीजफायर एलओसी पर सीजफायर का उल्लंघन हो चुका है। घुसपैठ की कोशिशें प्रतिदिन हुई है और आतंकी हमले भी बढ़े हैं।
विदेशी आतंकी संगठन सुरक्षा बलों को निशाना बना रहे और सेना को कीमत चुकानी पड़ रही है। तीन सौ आतंकी चार माह से घुसपैठ की कोशिश कर रहे हैं और चार हजार पीओके में जमे हैं।
लश्कर-ए-ताइबा के अलावा पाकिस्तान के तीन आतंकी संगठनों ने हाल के दिनों में जम्मू-कश्मीर को निशाना बनाना शुरू किया है।
इसमें शोहादा बिग्रेड भी शामिल है, जिसने बृहस्पतिवार को कठुआ में पुलिस थाने और सांबा में सेना के कारनेटर वारियर कैंप पर हमले की जिम्मेदारी ली है।
शोहादा ब्रिगेड के अलावा अल नसरीन और फरजंदाने मिलत नामक आतंकी संगठन में भी तालिबानी लड़ाके शामिल हैं। इसमें पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर के आतंकी भी हैं।
कश्मीर में जून के बाद से जितने हमले हुए हैं, उन सब में विदेशी संगठनों की ही भूमिका सामने आई है।
शोहादा ब्रिगेड, अल नसरीन और फरजंदाने मिलत ने जर्मनी दूतावास द्वारा आयोजित जुबिन मेहता के संगीत कार्यक्रम पर भी पहरा लगाया था।
हालांकि कार्यक्रम को रोका नहीं जा सका और इन संगठनों ने आतंकी हमले कर अपनी ताकत दिखाई। उस कार्यक्रम के बाद से शोपियां में एक पखवारे तक कर्फ्यू लागू रहा।
दरअसल, इस बार आतंकी संगठनों ने बाहर और भीतर दोनों मोर्चों पर तैयारियां की हैं।
सुरक्षा बलों के सूत्रों के अनुसार किश्तवाड़ दंगों में भी पाकिस्तानी एजेंसियों और आतंकी संगठनों की भूमिका रही थी। नकाबपोश द्वारा पत्थरबाजी की अफवाह फैलाकर दंगों की पृष्ठभूमि तैयार की गई।
पिछले साल सितंबर तक में सुरक्षा बलों के सात जवान शहीद हुए थे जबकि इस साल 42 की जानें जा चुकी हैं। सामान्य नागरिकों की मौत भी आठ से बढ़कर 12 हो गई है।